Skip to content

ग़ाज़ा, इस्राइल और इस्राइल बनने की मंशा

January 14, 2009

प्रणव मुखर्जी से किसी पत्रकार ने पूछा कि क्या भारत पाकिस्तान में वैसी ही कार्रवाई करेगा जैसी इस्राइल गाज़ा में कर रहा है. शुक्र है कि हमारे विदेश मंत्री ने  यह कहना ज़रूरी समझा कि इस्राइल की तरह भारत ने किसी और की ज़मीन पर कब्जा नहीं कर रखा है. इस सादे से तथ्य को कहना आजकल गनीमत है क्योंकि हमारे आदर्श बनते जा रहे अमरीका में फिलीस्तीनीयों को ही इस रूप में पेश किया जा रहा है मानो वे ही शांति से रहने वाले इस्राइलियों को चैन से नहीं रहने दे रहे. तो क्या यह मान लिया जाय कि हमारी याददाश्त भी ‘गजनी’ की तरह सिर्फ पंद्रह मिनट की रह गई है? क्या हम यह भूल गए है कि गाज़ा के उस पतली सी पट्टी में जो पिछले साठ  साल से पीसे जा रहे हैं वे एक ज़िओनवादी राज्य इस्राइल की स्थापना के लिए उनकी अपनी ज़मीन से उखाड कर फेंक दिए गए लोग हैं?

ग़ाज़ा पर इस्राइली बामबारी, सा�ार बीबीसी

ग़ाज़ा पर इस्राइली बामबारी, साभार बीबीसी

अगर हम साठ साल की बात को याद नहीं रखना चाह्ते तो क्या हम यह भी भूल गए हैं कि  अभी दो ही साल बीते हैं कि फिलीस्तीन की जनता ने हमास को चुनाव में बहुमत दिया था! क्या हमें यह भी याद दिलाना होगा कि हमास की चुनावी जीत को इस्राइल, अमरीका , युरोप और उनके पिट्ठू फतह ने मान्यता देने से इंकार कर दिया था?

एपी

बमबारी का एक और नज़ारा, तस्वीर: एपी

हमास एक आतंकवादी संगठन नहीं है, जैसा अमरीका और इस्राइल चाह्ते हैं कि उसे माना जाए, वह फिलीस्तीनी जनता का वैध प्रतिनिधि है. क्या चुनाव में उसकी जीत को मानने से इनकार  वैसा ही नहीं जैसा मुजीबुर्रहमान की जीत को मानने से तब की पकिस्तानी हुकूमत का इंकार ? उसका नतीजा था  पाकिस्तान का  विभाजन और बांग्लादेश के रूप में एक नए राष्ट्र का जन्म. यहां अंतर सिर्फ यह है कि हमास ने गाज़ा पट्टी पर संघर्ष के बाद नियंत्रण कर लिया. तब से इस्राइल के कहने पर अमरीका समेत पूरे विश्व ने हमास का बहिष्कार कर रखा है. क्या हम इसकी कल्पना कर सकते हैं कि भारत में भारतीय जनता पार्टी के चुनाव में जीतने के बाद उसकी राजनीति से असहमति रखने के कारण उसे मान्यता न दी जाए?

इस्राइल का कहना है कि चूंकि गाज़ा पट्टी की जनता ने हमास को चुना इसलिए वह गुनहगार है  और उसे इज्जत से जीने का हक़ नहीं है. गाज़ा की पूरी तरह से नाकाबन्दी कर दी गई है और वहां रहनेवाले फिलीस्तीनी आजीविका के हर साधन से वंचित कर दिए गए हैं. पूरी की पूरी आबादी सिर्फ  बाहर से मिलने वाली सहायता पर निर्भर हो कर रह गई है और वह सहायता भी इस्राइल की मर्जी से ही उसे मिल सकती है. मनुष्यता का न्यूनतम स्तर भी गाज़ा के लोगों को नसीब नहीं. हाल में वेटिकन के एक कार्डिनल ने कहा कि गाज़ा एक  ‘कांसेंट्रेशन कैम्प’ ही है. इस बयान पर इस्राइली भडक उठे हैं . उनका कहना है कि ऐसा कहकर कार्डिनाल युरोप के कांसेंट्रेशन कैम्पों में मारे गए यहूदियों का अपमान कर रहे हैं. युरोप के यहूदी विरोध का सामना सदियों से करने के बाद और खासकर हिटलर के द्वारा यहूदियों के कत्लेआम के बाद यहूदियों ने अपनी आत्मछवि एक ऐसे समुदाय की बना ली है, पूरी दुनिया जिसके खिलाफ है.
गाज़ा पर पन्द्रह दिनों से चल रहे हमले का औचित्य यह दिया जा रहा है कि हमास लगातार इस्राइली इलाकों पर राकेट दाग रहा है और किसी भी दूसरी सरकार की तरह इस्राइल की सरकार का फर्ज है कि वह अपनी जनता की रक्षा करे. हमास के राकेट दागे जाने का समर्थन कोई नही करेगा लेकिन साथ ही यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्यों गाज़ा की नाकाबन्दी जारी रखी  गई है! यह भी पूछा जाना चाहिए कि नवम्बर में इस्राइल ने गाज़ा में घुस कर क्यों हत्याएं कीं जो हमास के साथ उसके युद्ध-विराम का सीधा उल्लंघन था. जब अमरीका और इस्राइल के मित्र यह कहते हैं कि हमास ने युद्ध विराम पहले तोडा तो वे इस्राइल के नवम्बर के इस अपराध की चर्चा  भी नहीं करना चाह्ते. वे इसकी बात भी नहीं करना चाहते कि युद्ध-विराम में रोजाना गाज़ा में आवश्यक सामग्रियों की आपूर्ति की  जो शर्त तय थी, इस्राइल ने कभी उसका पालन नहीं किया. गाज़ा में दवाइयां उपलब्ध नहीं हैं. तेल के अभाव में बिजली की आपूर्ति नहीं है और इसके लिए सीधे तौर पर इस्राइल जिम्मेदार है क्योंकि हर चीज़ के आने-जाने पर उसी का नियंत्रण है. गाज़ा के पंद्रह लाख से ज़्यादा लोग दुनिया के सबसे बदहाल हालात में जीने को मजबूर कर दिए हैं लेकिन दुनिया के सारे देश, जो मानवाधिकार की हिमायत करते नहीं थकते, चुपचाप एक खामोश कत्लेआम देखते रहे. हमास ने युद्ध-विराम को आगे जारी रखने को व्यर्थ बताया क्योंकि इस्राइल की ओर से कोई सार्थक युद्ध-विराम नहीं था.
टोनी  ब्लेयर का कहना है कि युद्ध-विराम के लिए ज़रूरी होगा कि हमास सुरंगों के जरिए हथियारों की जो तस्करी कर रहा है, उस पर पाबंदी लगे. इस्राइल भी इन सुरंगों को नष्ट कर देना चाहता है. इन सुरंगों से सिर्फ हथियार नहीं आ रहे, इनसे खाने-पीने का सामान, दवाइयां भी आ रही हैं, जो इस्राइल की वजह से गाज़ा  के लोगों को मयस्सर  नहीं. सुरंगों को नष्ट करके इस्राइल गाज़ा को पूरी तरह लाचार करना चाह्ता है.

इस्राइल गाज़ा पर इस हमले में सारे युद्ध के सारे अंतर्राष्ट्रिय नियमों का और सारी नैतिकता का बेधडक उल्लंघन कर रहा है. आम तौर पर बयान न देने वाले रेड क्रास ने भी इस बार नाराज़गी  जताई है कि इस्राइली सेना ज़ख्मियों तक सहायता पहुंचने के रास्ते में अडंगा लगा रही है. इस्राइल ने जानबूझ कर संयुक्त राष्ट्र संघ की एजेंसी के द्वारा बनाई गई पनाह्गाह, एक स्कूल को निशाना बनाया, जिसके चलते करीब चालीस लोग मारे गए. हस्पतालों, स्कूलों, एम्बुलेंसवाहनों को निशाना बनाने में इसाइल को कोई हिचकिचाहट नहीं रही है. इस बार भी उसने संयुक्त राष्ट्र संघ के सहायतावाहन पर बम गिराया और सहायताकर्मी की हत्या कर दी.

अब तक गाज़ा में नौ सौ से ज़्यादा मौतें हो चुकी हैं. इनमें आधे से ज़्यादा साधारण नागरिक हैं. इसके बाद भी यह कहने वालों की कमी नहीं है कि इस्राइल हरसम्भव प्रयास करता है कि साधारण लोग न मारे जायें. सात जनवरी को मध्य  पूर्व के विशेषज्ञ पत्रकार राबर्ट फिस्क ने स्कूल पर इसाइली हमले के बाद लिखा कि उन्हें इस पर हैरानी होती है कि इतने सारे पश्चिमी राष्ट्रपति और प्रधान मत्री और कई संपादक और पत्रकार इस्राइल के इस झूठ पर यकीन करने  को तैयार हैं कि वह सामान्य नागरिकों की रक्षा की पूरी कोशिश करता है. फिस्क ने पूछा: “क्या हम भूल गए हैं कि लेबनान पर 1982 के इस्राइली हमले में मारे गए 17,500 लोगों में लगभग सभी नागरिक थे और ज़्यादातर तो बच्चे और औरतें थीं, सब्रा-शातिला के कत्लेआम में 1, 700 फिलीस्तीनी नागरिक मारे गए थे,काना की संयुक्त राष्ट्रसंघ की एक पनाहगाह में 1996 के कत्लेआम में 106 लेबनानी शरणार्थी , आधे से ज़्यादा बच्चे, मारे गए थे , 2006 में मारवाहिन शरणार्थियों को पहले  पर अपने घरों से बाहर निकलने का आदेश देकर फिर  इस्राइली हेलिकाप्टर  ने ही भून डाला था और2006 में इस्राइली बमबारी में 100 से ज़्यादा कत्ल किए गये लोगों में लगभग सभी साधारण नागरिक थे.”
इस्राइल कह रहा है कि उसकी मानवीयता में किसी को शक नहीं करना चाहिए. वह हर रोज़ तीन घंटे का विराम दे रहा है कि मुर्दे उठाए जा सकें और ज़ख्मी हस्पताल जा सकें. इस्राइल के पत्रकार आरी शावित ने ‘हारेत्ज़’ में लिखा  कि हमें खूब राहत पहुंचानी चाहिए, इससे इससे यह साबित होगा कि इस खूंखार युद्ध में भी हमें याद रहता है कि दूसरी तरफ भी आदमी रहते हैं. ‘हारेत्ज़’ में ही एक दूसरे पत्रकार गिडियोन लेवी ने ठीक ही लिखा है कि किसी भी हिसाब से इस युद्ध को उचित नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि यह एक ऐसी आबादी के खिलाफ है जो शायद दुनिया की सबसे असहाय आबादी है.गाज़ा के फिलीस्तीनियों के पास कोई सेना नहीं है. हमास के पास इस्राइल की तरह हथियारों का ज़खीरा नहीं है. इस्राइली नाइंसाफी के खिलाफ अपना गुस्सा दिखाने को जो राकेट वे छोड रहे हैं, वे भी घर के बनाए हुए हैं.
ह्रदयहीनता इस्राइल के बहुलांश का स्वभाव बन गई है. इस्राइली लेखक सामी मिखाइल  का कहना है कि इस्राइलियों को यही सिखाया गया है कि अरब मनुष्य नहीं हैं. इसलिए उनका मारा जाना तिलचट्टे के मारे जाने से कुछ अधिक नहीं.

अभी जब ये पंक्तियां लिखी जा रही हैं, इस्राइल गाज़ा के घर-घर में फोन कर रहा है और सन्देश दे रहा है कि वह हमास को खत्म करना चाहता है और हमास आबादी के बीच छिपा है, इसलिए उसके पास आबादियों पर हमला करने के अलावा कोई चारा नही. वह् लोगों को अपने घर छोड कर निकल जाने को कह रहा है. लोग सड्कों पर निकल आए हैं. पर  वे कहां जाएं? गाज़ा एक लंबी और छोटी पट्टी है. बाहर निकलने का हर रास्ता बंद है. अतर्राष्ट्रिय समुदाय खामोशी से इस्राइल की गुंडागर्दी देखी रहा है. क्या गाज़ा में जो मारे जा रहे हैं, उनका खून हम सबके हाथों पर नहीं जो चुप हैं? क्या गाज़ा के लोगों को पनाह देने  से जो दुनिया इनकार कर रही है, उसे क्या पत्थरदिली के अपने गुनाह की कीमत अदा  करनी नहीं पडेगी?
गाज़ा पर पंद्रह दिन से चल रहे इस हमले को रोकने में अंतर्राष्ट्रीय असमर्थता की  कीमत भी पूरी दुनिया को चुकानी पडेगी. फिलीस्तीन के प्रसंग में यह जाहिर हो गया है कि अमरीका और पश्चिमी दुनिया का लोकतंत्र प्रेम ढोंग है. अमरीका की नई चुनी गई कांग्रेस ने भी अपनी पहली बैठक में इस्राइल के प्रति पूरा समर्थन जताया है. नव निर्वाचित राष्ट्र्पति बराक  ओबामा के अस्पष्ट वक्तव्य से कोई राहत नहीं मिली है. तो क्या बीस जनवरी तक, जब ओबामा पद ग्रहण करेंगे, इस्राइल को छूट दी गई है कि वह जो करना चाहता है कर ले? लेकिन क्या तब तक बहुत देर नहीं हो  चुकी होगी? जहां तक हमास को नाकाम करने का स्वाल है, वह कभी नहीं होगा क्योकि इस्राइल ने उसके कई शीर्ष नेताओं को कत्ल कर दिया है पर हमास ज़िन्दा बना हुआ है. गाज़ा में और फिलीस्तीन में इस बेरहम कत्लेआम को देखते  हुए लोगों में जो गुस्सा जमा हो रहा है और जो नफरत बढ रही है, वह इस्राइल के लिए हमेशा अशांति का कारण बनी रहेगी. इस्राइली लेखक डेविड  ग्रोसमान  ने इस्राइल को हमला रोकने के लिए कह्ते हुए लिखा : “इस्राइली नेता बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि गाज़ा पट्टी जैसी जगह में पूरी-पूरी स्पष्ट सैनिक विजय हासिल करना बहुत मुश्किल है. बल्कि, ज़्यादा संभावना इसकी है कि हम उसी अस्पष्टता की हालत में लौटेंगे जिसे हम लेबनान के समय से अच्छी तरह जानते हैं. इस्राइल हमास पर वार करेगा और फिर उस पर वार होगा, फिर वह वार करेगा और फिर उस पर वार होगा, वह ऐसे हर तरह के फन्दे में फंस जाएगा जो इस तरह का जैसे-को-तैसा वाला रवैय्या तैय्यार करता है ….अपनी सारी फौजी ताकत के बावजूद हम अपने आपको  उबार पाने में नाकामयाब रहेंगे, और हमें पता चलेगा कि हमें हिंसा और विनाश का ज्वार बहा ले गया है.”  लेबनान पर हुए इस्राइली हमले में इस्राइली सेना का एक सैनिक डेविड ग्रोसमान का बेटा भी था, जिसे अपनी जान गवानी पडी. लेकिन इसकी उम्मीद कम है कि उनके इन विवेकपूर्ण शब्दों को इस्राइल में कोई सुनेगा. मैं लेकिन फिर भारतीय पत्रकार के उस प्रश्न पर वापस जाना चाह्ता हूँ जो उसने विदेश मंत्री से किया: क्या आप पाकिस्तान पर इस्राइल की तरह कार्रवाई करेंगे! यह प्रश्न किया जा सका, बावजूद उन सारी भयानक तस्वीरों के जो इस्राइली खूंरेजी की सबूत हैं, अपने आप में एक खतरनाक संकेत है. क्या हम भी इस्राइल बनना चाहते हैं?

3 Comments leave one →
  1. Arshad Ajmal permalink
    January 15, 2009 12:25 AM

    Thousands of Israelis came on the street against the war waged by Israeli government on GAZA. There are more voices of rationality and peace in Israel by Israeli citizens. These signs speak about the strength of Israeli society. I amanxious to know what they face bygovernment of Israel and right hand forces there.
    Today Arnab Goswami was questioning two Pakistani army (probably retired) men of Pakistan why India and how long it should hold its sixpoint plan of action starting from non normalising of cricket match to the last of war ion between diplomatic , trade and economic sanctions. Representative of an empire questioning its colony? Is this theway a nation becomes great. Incidently it is the day when Anil Ambani, Sunil Mittal proposed that Modi is theright kind of person for leading the country.
    Quite soothing to listen debate on NDTV this evening where Sidhharta Varadrajan and ex army men were trying to explain how to deal in logical conclusive manner against Pakistan on Mumbai terror. Dont pitch high the decibel and put the maximal demand but forward step by step will help in addressing the Mumbai issue.
    Thereare forces who are trying to emaluate Israel but very few voices vocal not to make it that way but make it a great nation by acting like great. The futility of Bush policy is in the Obama acceptancespeech, where he said we will be great by our idea not by our weapon and military might.
    Arshad

  2. Pawan Chaturvedi permalink
    September 23, 2010 3:19 PM

    i think whatever the israelis are doing is the right to save their own country but to kill the innocent philistine is very cruel.

  3. brijesh rawat permalink
    December 3, 2012 3:22 PM

    israil is great country.israilis tum bhaut bhadur ho,india ko tumse sikna chaiye.i love israil.

We look forward to your comments. Comments are subject to moderation as per our comments policy. They may take some time to appear.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 53,983 other followers

%d bloggers like this: