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माओवादी नेपाली कॉमरेडों से सबक लें

November 17, 2009

भारत के माओवादियों को नेपाल के माओवादियों से सबक लेना चाहिए, ऐसा पिछले दो साल से कहा जा रहा है. समझ यह रही है कि नेपाली माओवादियों ने सशस्त्र संघर्ष का रास्ता छोड़कर संसदीय लोकतंत्र में भागीदारी का फैसला किया . लेकिन नेपाली माओवादियों के प्रति भारतीय वामपंथियों के आकर्षण की वजह शायद यह भी रही है कि उन्होंने दीर्घ जनसंघर्ष के रास्ते वह हासिल कर लिया जो यहां की  कम्युनिस्ट पार्टियों ने  अलग-अलग समय में हथियारों के सहारे हासिल करना चाहा था और जिसमें वे सफल नहीं हो पाईं. संसद में हिस्सा लेने के उनके निर्णय को उनकी परिपक्वता का सबूत  माना गया. संसदीय लोकतंत्र को लेकर माओवादियों या आम तौर पर कम्युनिस्ट दलों का रुख क्या रहा है, यह उनके दस्तावेजों को पढ़ने से मालूम हो जाता है. वे इसे लोकतंत्र  की एक हेय या हीन अवस्था मानते हैं और इसे अपना ऐतिहासिक दायित्व मानते हैं कि वे लोकतंत्र को एक उच्चतर अवस्था पर ले जाएं. चूंकि समाज के विकास का एक नक्शा उनके पास है, जिसमें सामंतवाद के बाद पूंजीवाद का आना अनिवार्य है और तभी समाजवाद  के लिए आवश्यक  उत्पादन-पद्धति और उत्पादन संबंध की ज़मीन बन सकती है, यह जिम्मेवारी भी वे अपने ऊपर ले लेते हैं कि सामंतवाद से पूंजीवाद के संक्रमण को वे पूरा करें.
दुनिया भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों के इतिहास से हमें यह मालूम होता है कि जिसे वे बोर्जुवा लोकतंत्र कहती हैं, उसके भागीदार दल कमजोर हैं क्योंकि “राष्ट्रीय बोर्जुवा” में ताकत नहीं और वह “राष्ट्रीय बोर्जुवा क्रांति” नहीं कर सकता. इसलिए यह काम भी कम्युनिस्ट दलों का ही है कि वे क्रांति के इस चरण को पूरा करने में अपनी ताकत लगाएं. लेकिन उन्हें यह पता है , क्योंकि मार्क्सवाद-लेनिनवाद ने उन्हें वैज्ञानिक समझ दी है कि इस क्रांति के बाद बना हुआ राज्य भी और कुछ नहीं, प्रतिक्रियावादी वर्ग की तानाशाही है. इसलिए  यह स्वाभाविक ही है कि वे राष्ट्रीय बोर्जुवा क्रांति के इस दौर के बाद दूसरी क्रांति की तैयारी में लग जाएं.

बोर्जुवा लोकतंत्र में संसदीय प्रक्रिया में कम्युनिस्ट दलों की भागीदारी पूरी तरह से रणनीतिक है . उनकी समझ है कि इस जगह का इस्तेमाल करके वे नई लोकतांत्रिक या समाजवादी क्रांति के विचार का प्रचार कर सकते हैं और उसके लिए गोलबंदी कर सकते हैं. लेकिन अगर यह नव लोकतांत्रिक या समाजवादी क्रांति अगर हो जाए तो वे किस प्रकार का लोकतंत्र स्थापित करेंगे? हाल में वर्ल्ड पीपुल्स रिवोल्युशनरी मूव्मेंट को दिए एक इंटरव्यु में नेपाली कम्युनिस्ट नेता बाबूराम भट्टाराई ने साफ तौर पर कहा कि नए ढांचे में प्रतिक्रियावादी, साम्राज्यवादी और अपराधी तत्वों को भाग नहीं लेने दिया जाएगा. यह तय कौन करेगा? जाहिर है, वही जिसके पास सबसे वैज्ञानिक दृष्टि होगी और जो समाज के अग्रगामी वर्ग का अगुवा दस्ता होगा. वह कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़कर और कौन हो सकता है? इतिहास विधाता ने उसे इस विशॆष गुण से विभूषित करके यह जिम्मा दे रखा है और इस विषय में किसी भी तरह का समझौता इतिहास के साथ गद्दारी से कम नहीं. चूंकि इतिहास के पिछले दौर के अवशेष शेष रह जाएंगे , यह भी इन्हीं क्रांतिकारी दलों का काम होगा कि वे इन दूषित तत्वों से समाज को मुक्त करें. इसके लिए सारे तरीके जायज हैं और इन तत्वों का शारीरिक सफाया इनमें से एक है.

लेकिन क्या क्रांति यहां रुक जाएगी? वह तो एक ऐसी प्रक्रिया है जो सतत प्रवहमान है. लेकिन वह अपने आप नहीं होती . हस्तक्षेप करने का अधिकार कम्युनिस्ट दलों को ही हासिल है. दिक्कत सिर्फ यह है कि एक ही देश में कई कम्युनिस्ट दल हो सकते हैं. फिर इनमें से किसके पास यह अधिकार है. और यह तय कौन करेगा? अगर भारत का उदाहरण लें, तो हर बाद में आने वाले कम्युनिस्ट दल ने यह दावा किया कि मार्क्सवाद    की ज़्यादा क्रांतिकारी समझ उसके पास है और पिछला दल या तो सुधारवाद या संशोधनवाद का शिकार हो गया है और इस तरह इतिहास का दायित्व वहन करने का अधिकार  अब वह खो बैठा है. इसलिए उस दल को भी शारीरिक रूप से समाप्त करना जायज ही नहीं, ज़रूरी भी हो उठता है. भारत में सी.पी.एम. ने सी.पी.आई. से अधिक क्रांतिकारी होने का दावा किया और इसलिए इतना काफी नहीं था कि वह उसे चुनाव में चुनौती दे, अनेक स्थानों पर जनता को उसके गलत प्रभाव से मुक्त करने के लिए सी.पी.आई. पर शारीरिक आक्रमण करना अवश्यक था. फिर सी. पी.एम. एम. से भी अधिक वैज्ञानिक मार्क्सवादी प्रबोधन का वरदान जिस दल को मिला, उसने दोनों कम्युनिस्ट दलों के प्रति यही रुख अपनाया.पिछली सदी के अखिरी दशक में संसदीय राजनीति में हिस्सा लेने का निर्णय करने के बाद सी.पी.आई. लिबरेशन की भी यही गति हो गई. उसके  अनेक कार्यकर्ताओं और नेताओं की माओवादियों ने हत्या की. अधिक अगे बढ़ॆ क्रांतिकारी दल के सदस्य हो सकता है कई बार यह इच्छा खो बैठें. फिर ऐसे कम्जोर  तत्वों का जीवित रहना भी पाप है क्योंकि उन्होंने इतिहास के साथ धोखा किया है.

अंतिम क्रांति कब होगी? यह कहा नहीं जा सकता.क्योंकि क्रांति सतत आशंका से ग्रस्त रहने को बाध्य है या उसे हमेशा चौकस रहना है. यह क्रांतिकारी आशंका लेनिन के समय से विद्यमान है और हर देश में कम्युनिस्ट दल इससे पीड़ित रहे हैं. स्तालिन को क्रांति की पवित्रता को बचाए रखने के उद्देश्य से ही  लाखों हत्याएं करने पर मजबूर होना पड़ा. “ चेयरमैन माओ” ने यह मह्सूस किया कि क्रांति के भीतर ऐसे कीटाणु और विषाणु पैदा हो गए जो उसकी देह को सड़ा देंगे. इन्हें पूरी तरह से खत्म किए बिना क्रांति की रक्षा सम्भव नहीं. इसलिए उन्हें सांस्कृतिक क्रांति की प्रक्रिया चलानी पड़ी.

चाहे स्तालिन हों या माओ, उन्होंने  इस सतत हत्याकांड में बड़े पैमाने पर दल के सदस्यों को शामिल कर लिया. इस तरह यह कोई वैयक्तिक फैसला नहीं रह गया और पूरा दल इसका हिस्सेदार हो गया.  इतना ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय विचारधारा होने के कारण दूसरे सभी देशों के  कम्युनिस्ट दल भी इसके लिए अपने आप को जिम्मेवार समझते है और इसीलिए लेनिन, स्टालिन या माओ के हिंसात्मक क्रांतिकारी अबियान के लिए तर्क देना वे अपना कर्तव्य समझते हैं. यह तर्क तभी मजबूत हो सकता है जब वे अपने देशों में भी  इसके अपने संस्करण लागू करें. नेपाल के माओवादियों ने स्पष्ट कर दिया है कि क्रांति रुकी नही है. भारत के माओवादियों के लिए  अभी यह कहने का वक्त भी नहीं आया.

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  1. November 18, 2009 12:43 PM

    how many people “were killed” in the cultural revolution? perhaps less than those killed by Indian railways recently (nobody talks about Mamata’s resignation, as it was done during Laloo’s or Nitish’s tenure! – certainly there is a conspiracy angle to this). what cultural revolution did was simply make tired ex-commies, like many in Kafila, go back to school…

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