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यहाँ से शहर को देखो…

December 3, 2011

(नई दिल्ली का सौवां साल शुरू होने पर हिंदी साप्ताहिक आऊटलुक  में यह लेख पहली बार प्रकाशित हुआ था.)

अब जबके हर तरफ यह एलान हो चुका है के दिल्ली १०० बरस की हो गयी है और चारों ओर नई दिल्ली के कुछ पुराने होने का ज़िक्र भी होने लगा है, इन दावों के साथ साथ के दिल्ली तो सदा जवान रहती है और देखिये ना अभी कामन वेल्थ खेलों के दौरान यह एक बार फिर दुल्हन बनी थी वगेरह वगेरह तो हमने सोचा के क्यों न इन सभी एलान नामों की सत्यता पर एक नजर डाल ली जाए, और इसी बहाने उस दिल्ली वाले से भी मिल लिया जाए जो इस अति प्राचीन/ मध्य कालीन/ आधनिक नगरी का नागरिक होते हुए भी वैशवीकरण के झांसे में इतना आ चुका है के वो अपने आप को २१वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में आने वाले आर्थिक संकट को पछाड देने वाले चमचमाते भारत देश की राजधानी का शहरी  होने का भरम पाले हुए है.

अब सब से पहले तो यह फैसला कर लिया जाए के नई दिल्ली है किस चिड़िया का नाम? पाकिस्तान के मशहूर व्यंग कार इब्न-ए –इंशा ने अपनी व्याख्यात पुस्तक उर्दू की आखरी किताब में एक अध्याय लाहौर के बारे में लिखा है,  इस अध्याय में इंशा कहते हैं “ किसी ज़माने में लाहौर का एक हुदूद-ए–अरबा (विस्तार) हुआ करता था अब तो लाहौर के चारों तरफ लाहौर ही लाहौर वाके (स्थित) है और हर दिन वाके-तर  हो रहा है”

एक फर्क है, इब्न-ए-इंशा के लाहौर में पुराना लाहौर और नया लाहौर दो अलग अलग चीज़ें नहीं हैं मगर दिल्ली के मामले में ऐसा नहीं है, एक समय था के नई दिल्ली में बाबू बसा करते थे और नई दिल्ली के पास शाहजहानाबाद था जो शहर था, अब नई दिल्ली वालों के हिसाब से पुराना शहर सिर्फ शादी के कार्ड, आचार मुरब्बे और हार्डवेअर खरीदने की जगह है, या उसे इस लिए बनाया गया है के उनकी पार्टियों के लिए बिरयानी, चाट, कुल्फी वगेरह मुहैया करवाए और जब उनके विदेशी मित्र या एन आर आई सम्बन्धी यहाँ आयें तो उन्हें इस जीते जागते संघ्राल्य के दर्शन करवा सकें. मुसलमान और सिख वहाँ धार्मिक कारणों से भी जाते हैं, मगर उनकी बात अलग है वो तो अल्प संख्यक हैं हम तो आम लोगों की बात कर रहे हैं.

नई दिल्ली शासकों का शहर है यहाँ देश का भविष्य निर्धारित किया जाता है  और ऐसा तब  से हो रहा है जब से नई दिल्ली बनी है. राम भला करे, सरदार शोभा सिंह का और उनके साथ के दुसरे ठेकेदारों का जिन्होंने ने लुटियनस व बेकर साहेब के नक्शे के हिसाब से नई दिल्ली बनाई. रायसीना की पहाड़ी से जार्ज पंचम की मूर्ती तक, गोरों के लिए एक खुली सड़क थी, इसे किंग्स वे (राज पथ) कहते थे, जार्ज पंचम की मूर्ती को दिल्ली की धूप से बचाने के लिए एक छतरी के नीचे बिठाया गया था, किंग्स वे को एक और सड़क काटती थी जो क्वींस वे (जन पथ) कहलाती थी  इन सड़कों पर रिक्शा, तांगे साईकिल चलाने की इजाजत तब नहीं थी, आज भी नहीं है. तब हम गुलाम थे, अब नहीं हैं, सड़कों और ट्रेफिक पुलिस को अभी इस तब्दीली की खबर किसी ने नहीं दी है.

खैर इसे छोडिये हम शोभा सिंह और उनके साथी ठेकेकेदारों की बनायीं हुई नई दिल्ली की बात कर रहे, उन्ही शोभा सिंह की जिन्होंने भगत सिंह के खिलाफ हल्फिया ब्यान दिया था और नई दिल्ली की एक बोहत बड़ी ट्रेफिक सर्कुलेटरी का नाम विंडसर प्लेस से बदल कर उनके नाम पर किया जाने वाला है. यह अभी तक नहीं पता चल पाया के यह सम्मान उन्हें नई दिल्ली के प्राथमिक श्रेणी के ठेकेदार होने की वजह से दिया जा रहा है यह अव्वल दर्जे के मुखबिर होने की वजह से.  यह कहना भी मुश्किल है के मुखबिरी ठेकेदारी के मार्ग प्रशस्त करती है या ठेकेदारी मुखबिरी में मदद गार साबित होती है.

बहरहाल जो  नई दिल्ली इन लोगों ने मिल कर बनाई वो इस से पहले के १००० बरसों में दिल्ली में बनने वाली ७ दिल्लियों से अलग थी. लाल कोट, सीरी, तुगलकाबाद, जहाँपनाह, फिरोजाबाद (कोटला फिरोज़शाह), पुराना किला और शाहजहानाबाद इन सभी शहरों को बनाने वाले यहाँ रहने आये थे, नई दिल्ली को बनाने वाले भारत को लूटने आये आये थे और आज भी नई दिल्ली के निवासियों के बहुमत का पेशा यही है.

नई दिल्ली एक पूरी तरह से नया बनाया जाने वाला शहर था और शहर रातों रात नहीं बनते, तो नई दिल्ली को बनने में भी कई साल लगे, यह सही है के राजधानी को १९११ में  दिल्ली ले आया गया था मगर तब तक नई दिल्ली तैयार नहीं थी काफी समय तक विसरॉय साहेब को दिल्ली यूनिवर्सिटी में वाईस चांसलर के वर्तमान     दफ्तर मैं रहना पड़ा जो आज भी ओल्ड वाईस रीगल लाज कहलाता है.

वो सारी की सारी इमारतें जो आज नई दिल्ली की विरासत के नाम से पेश की जा रही हैं  दरअसल १९३० के बाद बनी हैं, राष्ट्रपति निवास, संसद भवन , नार्थ और साउथ ब्लाक, इंडिया गेट आदि सभी. पुरातात्विक संरक्षण के कानून के अनुसार केवल वो ही इमारतें संरक्षण की सूची में लाइ जा सकती हैं जो कम से कम सौ बरस पुरानी हों और उनमें कुछ ऐसा हो जो वास्तुकला के नज़रिए से महत्वपूर्ण हो. मने दिल्ली की अधिकतर इमारतों को सौ वर्ष पुरान्ना होने के लिए २५ वर्ष तो इन्तेज़ार करना ही पड़ेगा.

सवाल यह है के फिर १०० बरस पूरे होने का यह शोर क्यों है, मामला साफ़ है कोई भी इमारत १०० बरस पुरानी नहीं है लेकिन अगर इस पूरे क्षेत्र को संरक्षित सूची में ले आया गया तो सारे मंत्रियों और बड़े बाबूओं   के बड़े बड़े बंगले संरक्षित सूची में आ जायेंगे दुनिया भर की नज़रें अंग्रेजों की बनायीं हुई राजधानी की तरफ लग जायेंगी और कोई यह नहीं पूछे गा के ३५० बरस पुराने शाहजहानाबाद को संरक्षित क्यों नहीं किया

असल मकसद नई दिल्ली और उसके विशेष निवासियों के हितों की रक्षा है हमारी धरोहर का संरक्षण नहीं. यह वो जगह है जहाँ के निवासी अपने इलाके को भारत का पर्याय समझते हैं. यहीं बैठ कर दरिद्रता की रेखा के नीचे रहने वालों को दी जाने वाली रियायतें समाप्त की जाती हैं यहीं शिक्षा को व्यसाय बनाने की और स्वास्थ सेवाओं को निजी कारोबार बनाने की योजनाएं देश के विकास के नाम पर बनाई जाती हैं. यहीं मुफ्त में बिजली पानी और टेलीफ़ोन की सुविधाएँ प्राप्त करने वाले लोग गरीबों को यह बताते हैं के सुविधाएँ निशुल्क तो उपलब्ध नहीं करवाई जा सकतीं.

इसी नई दिल्ली के चारों और नई दिल्ली रोज फैल रही है, इब्ने इंशा ने लाहौर के चारों ओर फेलते हुए लाहौर की तुलना एक नासूर से की थी  एक ऐसा घाव जो लगातार फेलता जाता हो, दिल्ली की हालत भी कुछ ऐसी ही होती जा रही है. बोहत सी पुरानी बस्तियों और पुराने गाँव इस लगातार पसरते हुए महानगर ने लील लिए हैं

नई दिल्ली के चारों तरफ जो फैलाव हुआ है उसमें ऐसे इलाके भी हैं जहाँ आम तौर पर धनवान और प्रभावी लोग ही रहते हैं, ऐसे लोग जो अपनी गर्भवती बहुओं को हर बार विदेश भेज देते हैं और ऐसा तब तक करते रहते हैं जब तक वो पुत्र को जन्म नहीं दे देतीं, इन इलाकों में महिलाओं की जनसंख्या के आँकड़े हरियाणा पंजाब और राजस्थान से भी बुरे हैं. ऐसे कोई लोग अगर कभी  गिरफ्तार हुए होंगे तो ऐसा बड़ी खामोशी से हुआ होगा क्योंके आज तक किसी चैनल ने यह न्यूज़ ब्रेक नहीं की है. बलात्कार के मामले में  दिल्ली देश के हर शहर से आगे है इतना आगे के अब पुलिस प्रमुख केवल अमरीकी नगरों के अपराध आंकड़ों की तुलना मैं ही दिल्ली को  पीछे दिखा सकते हैं.

नई दिल्ली वो शहर है जहाँ लोग एक दूसरे का खून इस लिए कर देते हैं के उन्हें ओवरटेक करने से रोका क्यों गया, यह वो शहर है जहाँ व्यापार, ज़मीन की खरीद और फरोख्त और सरकारी नौकरियां सब से बड़े  पेशे हैं  जमीन के हर सौदे मैं धान्दली होती है, हर व्यापारी टैक्स की चोरी करता है हर सरकारी अफसर किसी न किसी ढंग से ऊपर की कमाई के रास्ते ढूँढता है और ढूँढ लेता है और फिर यह सब मिलकर भ्रष्टाचार के खिलाफ नारे लगाते हैं, टेलिविज़न चैनल को इंटरव्यू देते हैं जंतर मंतर पर धरना देते हैं और इंडिया गेट पर मोम बत्ती भी जलाते हैं

यह वो शहर  है जो १९८४ में या तो सिक्खों की हत्याओं में शामिल था या कायरों की तरह छुपके बैठा था और अफवाहें फैला रहा था सिर्फ मुठ्ठी भर कलाकार थे जो सड़कों पर आये थे. किसी गुंडे का हाथ पकडना या बूढों औरतों और बच्चों के लिए, जगह छोड़ देना दिल्ली के मर्दों की शान के खिलाफ है, अपनी बारी का इन्तेज़ार करने से हमारी मर्दानगी पर आंच आती है,

यह शहर कमजोर पर डंडा चलाने में माहिर है, जिस की जितनी बड़ी गाडी है वो उतना ही बड़ा दादा है, शहर की योजना बनाने वाले भी इसी मर्ज़ के शिकार हैं अब पैदल चलने वाले और साईकिल चलाने वाले किसी और शहर में रहें क्योंके इस शहर में उनके लिए जगह है ही नहीं. शहर में जमीन के इस संकट को ध्यान में रखते हुए ही राज्य सरकार और न्याययालों ने कई बरस पहले ही सारी फक्ट्रियां बंद करने के आदेश जारी कर दिए थे. न मजदूर होंगे न साईकिल चलाएंगे जो फुट पाथ बचे हैं उनपर कूड़े के ड्लाओ और पुलिस चोकियों के बाद जगह ही कहाँ बची है के पैदल चलने वाले शहर का रुख भी करें.

तो यह है वो नई दिल्ली जिसने अपने अस्तित्व के १०० सालों में १००० साल से ज्यादा पुरानी शहरी धरोहर को लग भग पूरी तरह भुला दिया है, १९४७ के बाद जिस तेज़ी से इस शहर की काया पलट हुई आबादी लग भग पूरी तरह बदली और ३००,००० का शहर १४०००००० का शहर हो गया, समुदायों में, बिरादरियों में, सम्प्रदायों में जो रिश्ते बने थे जो संतुलन स्थापित हुआ था वो सब क्षण भर में नष्ट हो गया और फिर उसे स्थापित करने की कोई कोशिश नहीं की गयी, मुट्ठी भर पागल लोगों के करने से यह होने वाला नहीं था,  सुभद्रा जोशी , डी.आर.गोयल. अनीस किदवाई जैसे लोग लगे रहे मगर मोहब्बत के तिनकों से नफरत का सैलाब कहाँ रुकता.

नई दिल्ली को शहर कहना आसान नहीं है, मीर तकी मीर ने कहा है के
“बस्ती तो फिर बस्ती है –बस्ते बस्ते बस्ती है”

 कोई जगह शहर तब बनती है जब उसे बसे हुए कई सदियाँ बीत गयी हों, उस का अपना संगीत हो, अपना शिल्प हो, अपना खास भोजन हो, जीने की अपनी विशिष्ट लय और ताल हो, अपने मेले ठेले हों, तीज तहवार हों जहाँ यह सब न हो और जहाँ से कहीं और जाने के लिए रात के ८ बजे के बाद कोई साधन भी  उपलब्ध न हो, जहाँ सारे बाज़ार रात को ८ बजे तक बंद हो जाएँ और जहाँ चाय की दूकान भी ९ बजे के बाद खुली न मिले,  ऐसी जगह सरकारी दफ्तर के सामने वाली गली तो हो सकती है शहर नहीं.

आपको  यकीन नहीं आता पंडारा रोड, औरंगजेब रोड, मान सिंह रोड, अकबर रोड, मोती लाल नेहरु मार्ग, मौलाना आज़ाद रोड ,पंडित पन्त मार्ग, रकाब गंज रोड, भगवान दास रोड, कपरनिकस मार्ग, गोल्फ लिंक्स, तुगलक  रोड वगेरह पर चाय की दूकान, खाने के लिए कुछ भी, पीने के लिए पानी, घर जाने के लिए बस  या लघु शंका के समाधान के लिए निर्मित कोई सुविधा ढूँढ  कर तो देखिये. विष्णु खरे ने अपने संकलन “सब की आवाज के पर्दे में” इस इलाके का ज़िक्र एक कविता में किया है उन्हें शक है के यहाँ केवल भूत प्रेत रहते हैं क्योंके उन्होंने यहाँ दिन में कभी इंसान को देखा ही नहीं.

इस शहर में  बुहत सा पैसा बुहत जल्दी आ गया है, ज़मीन की बढती हुई कीमत, टैक्स न देने की खानदानी परंपरा, जहेज के लिए किसी भी हद से गुजर जाने की आदत इस सब ने जो बेतहाशा दौलत दी है उसे हजम कर पाना आसान नहीं नौ दौलते (नव धनाड्य) लोगों के शहरों में यही होता है, अगर नौ दौलते पिछली पीढ़ियों के नुकसानों की भरपायी की कोशिश भी कर रहे हों तो मामला और गंभीर हो जाता है अगली दो तीन पीढ़ीयों तक  इस शहर की हालत और बिगड़ेगी जब तक नई दिल्ली सच मच पुरानी नहीं हो जाती असल में शहर  नहीं बन जाती तब तक यह ओछे नव धनाड्यों का शहर ही रहेगी और तब तक औरतें बूढ़े बच्चे गरीब और कमज़ोर लोग इस शहर में असुरक्षित ही रहेंगे.

6 Comments leave one →
  1. zahoor siddiqi permalink
    December 3, 2011 5:26 PM

    ‘Roz jeeta houn roz marta houn / jab terey shehar sey guzarta houn’

    • Malay Deb permalink
      December 6, 2011 11:53 PM

      Well said.Feel the same,every day when in Calcutta (for me no Kolkata).

  2. Ram Sharma permalink
    December 3, 2011 7:53 PM

    Sohail, I enjoyed your posting. Well witten. I wish I could type in devanagari. Beg forgiveness.

  3. Iqbal Abhimanyu permalink
    December 4, 2011 1:58 AM

    बहुत अच्छा लगा. दुबारा डाला तब भी… शहरों की भी अपनी कहानी होती है. मैं भी लिखना चाहूँगा किसी दिन, किसी गुमनाम कसबे की कहानी.. जहां सत्ता के गलियारे नहीं, यादों के बंटवारे नहीं. हो सकता है मिले ही नहीं ऐसा कस्बा. पर खोज जारी रहेगी.

  4. akhtarkhan permalink
    December 4, 2011 2:00 PM

    log jab paese se muhbbat karte chale jayenge to inshanyat kahan bachegi .aur inshanyat ka khoon karne wale logon ko shahar ki fikr kyon hogi.

  5. Malay Deb permalink
    December 7, 2011 12:04 AM

    Being a bengali could read with some difficulty, understood the essence of it.Is it possible to have the english translation?

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