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सत्ता और हिंसा : बद्री नारायण

April 4, 2012

बद्री नारायण का यह लेख लखनऊ के एक हिंदी अख़बार को दिया गया था पर उन्होंने छापने से मना कर दिया.

शक्ति अपने संस्थागत रुप में सत्ता में तब्दील हो जाती है। सत्ता अपने मूल अर्थ में भय एवं हिंसा पर टिकी होती है। सत्ता का अभ्यांतरिकरण हो या सत्ता का प्रतिरोध, दोनों ही अर्थो में हिंसा उसके सह उत्पादक के रुप में दिखाई पड़ती है। जनतंत्र को एक ऐसी प्रक्रिया के रुप में परिकल्पित किया गया था जो सत्ता को उसके हिंसक पक्ष से मुक्त कराके सेवाभाव के एजेन्सी के रुप में सक्रिय रखे। यह माना जा रहा था कि जनतंत्र सत्ता को रेशनालाइज कर उसे सेवा-भावि प्रशासकीय स्वरुप में तब्दील कर देती है। यह काफी कुछ हुआ भी किन्तु अपने कार्य-प्रक्रिया में इस जनतांत्रिक समय में भी सत्ता हिंसा को उत्पादित करते रहने वाली शक्तिस्रोत के रुप में सामने आई है। सत्ता पहले अपने भीतर अपने ही कारणो से क्राइसिस को जन्म देती है, फिर उससे उबरने के लिए हिंसा रचती है। बंगाल, झारखण्ड, आन्ध्र के जंगलों में पहले तो बाजार शासित विकास के तहत आदिवासी जीवन के संसाधनों पर कब्जा कर उन्हे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बेचना, फिर उसके विरोध में आदिवासी जनता का नक्सलवादी विचारों एवं नेतृत्व में हिंसक प्रतिरोध का बढ़ते जाना, पुनः उसे दबाने के लिए राज्य द्वारा की जाने वाली ज्यादा आक्रामक एवं खुंखार हिंसा को इसी रुप में देखा जा सकता है।

सत्ता-शक्ति एवं हिंसा का दूसरा रूप अभी हाल में उत्तर प्रदेश में हुए विधान सभा चुनाव में देखा जा सकता है। यहाँ  हुए विधान सभा चुनाव में दलित शक्ति की प्रतीक बनकर उभरी बी0एस0पी0  की पराजय हुई। समाजवादी पार्टी, जिसके वर्ग चरित्र में मध्य जातियों का अधिपत्य है, सत्ता में आई। चुनाव परिणाम की घोषणा के दिन से ही दलितों पर सत्ताशाली दल के समर्थकों द्वारा हिंसक आक्रमण का क्रम अनवरत जारी है। दलित बस्तियों में जाकर धमकाना, दलितों को मारना-पीटना, उनकी गोली मारकर हत्याएं, दलितो में भी अति दलित नट जातियों जैसे अत्यन्त कमजोर समूहों की बस्ती में घुसकर उनकी झोपड़ी फूँक देने की घटनाएं रोज-रोज हो रही है। इनमे कई में तो सत्ताशाली दल के विधायक एवं मत्रियों के नाम एफ0आई0आर0 दर्ज हो रहे हैं। मीडिया में जो खबरें आ रही है, उनमें इन्हें चुनावी वैमनस्य का नतीजा मानते हुए बी0एस0पी0 के समर्थकों की हत्या के रूप में देखा जा रहा है। एक क्षण मान भी ले कि यह सत्ताशाली दल द्वारा बी0एस0पी0 के समर्थकों पर की जा रही हिंसा है, पर बी0एस0पी0 का इन पर आश्चर्यजनक रूप से अपनाया गया मौन चिन्ताजनक है।  न केवल बी0एस0पी0 कोई भी राजनीतिक दल इन घटनाओं के प्रतिरोध में कुछ बोल नही पा रहा है। अजब असंवेदनशीलता हम सबमे देखी जा रही है। शायद हम इसे चुनावी प्रक्रिया का ‘रूटीन हिंसा’ मानकर बैठ जाते हैं। सिविल सोसाईटी जो मूलतः अपने चरित्र में मध्यवर्गीय है, दलित दमन की इन घटनाओं पर कुछ भी नही बोल रही है। कांग्रेस अपने आपेक्षित परिणाम न आने के गम से ही अभी उभर नही पाई है।

बी0जे0पी0 जैसी राष्ट्रीय पार्टी एवं अपना दल, प्रगतिशील समाज पार्टी, जैसी छोटी पार्टियां टी0एम0सी0, एन0पी0सी0 जैसे छोटे दल जो हाल में हुए चुनाव में यहाँ चुनाव लड़ने तो आ गए थे, पर ये अपना कोई भी मानवीय कन्सर्न उत्तर प्रदेश में हो रही ऐसी घटनाओं में पर नही दिखा रही है। दलित राजनीति करने वाले राजनीतिक दल तो चुप हैं ही, दलितों के नाम पर फण्ड लेने वाले तमाम एन0जी0ओ0, दलित बौद्धिक सब मूक हैं।

वस्तुतः समाज का एक वर्ग जो नयी सत्ता को अपने भीतर अंगीकार कर रहा है, हिंसक हो उठी है। एक नव सत्ता उन्माद में वह सामाजिक जीवन में अपने अधिपत्य के खिलाफ मायावती के शासनकाल में पिछले 5 वर्षो में दलित समूहों के शक्तिवान होने से पैदा हुए विद्वेष को हिंसा की भाषा में व्यक्त कर रहा है। कुछ लोग इसका कारण एस0सी0/ एस0टी0 एक्ट की प्रतिक्रिया मान रहे हैं। कुछ लोग पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में भूमिवान जाति के रूप में उभरी मध्य जातियों एवं उनके सहजातियों का दैनन्दिन जीवन में अपने दलित श्रमिकों से होने वाले टकराव एवं पिछली सरकार में दलितों को राजसत्ता से मिले समर्थन के विरुद्ध एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया माना जा रहा है। पिछले दिनों दलितों में सामाजिक आत्मविश्वास, सर उठाकर चलना, अपनी अस्मिता का बखान एवं मुखर होकर अपनी राजनीति को व्यक्त करने की दलितों में उभरी प्रवृति के दमन के रुप में देखा जा रहा है। कुछ लोगों का मानना है कि ऐसे टकराव तो होते हैं, पर ऐसी मुखर हिंसा इसलिए है क्योंकि समाजवादी पार्टी की पूरी संचरना में हिसंक तत्व शामिल हैं जो सत्ता में आने पर अबाध हो चुके हैं। इतने अबाध कि मुलायम सिंह एवं नये युवा मुख्यमंत्री श्री  अखिलेश जी के बार-बार किए जाने वाले आग्रहों को भी ठुकरा दे रहे हैं। राज्य प्रशासन चाह करके भी इन निरंकुशो को नियत्रित नही कर पा रही है।

जनतंत्र का एक महत्वपूर्ण रुप चुनाव है। जनतंत्र द्वारा इस रुप में सृजित की जा रही हिंसा को हम कैसे देखें। क्या ऐसी प्रवृत्तियों के खिलाफ सत्ताशाली दल में एक मजबूत राजनीतिक इच्छा शक्ति की जरुरत नही है? जिस प्रकार बिहार में नीतीश कुमार ने तमाम आपराधी तत्वों को जेल में डाल कर उनहें सजा दिलाकर अपनी सत्ता को रेशनालाईज कर उसे ‘प्रशासन’ एवं विधि विधान के शासन में तब्दील करने की प्रतिबद्धता दिखाई है। क्या उसकी जरुरत उत्तर प्रदेश में नही है? क्या अन्य राजनीतिक दलो में इस मुद्दे पर एक सार्थक राजनीतिक कार्यवाही की जरुरत हमें तुरन्त नही महसूस होती।

पहले बूथ कैप्चरिंग कर अधिपत्यशाली समूह उपेक्षितों एवं सीमांत पर बसी जातियों को वोट नही देने देती थी, अब एक लम्बे समय तक चले सामाजिक एवं जनतांत्रिक सशक्तिकरण की प्रक्रिया में जब वे शक्तिवान हो जनतांत्रिक मुखरता से वोट डाल रही है तो वोट डालने के बाद शक्तिवानों के दबाव का यह रुप ज्यादा आक्रामक एवं हिंसक हो उठा है। किन्तु इसका प्रतिकार भी हिंसक हो यह जरुरी नही। यह जरुरी नही कि दलित जातियां स्वयं हिंसा से ही इसका जबाब दे। आज मुझसे बात चीत में दलित पुस्तिकाओं के एक विक्रेता साथी ने अत्यन्त दुख से कहा मायावती तो दिल्ली जा बैठी है। भ्रष्टाचार में फॅसने के डरने से वे शायद बोले ही न। अब लगता है कि हम पढ़े लिखों को ही हथियार उठाना पड़ेगा। दुख एव परेशानी मे सोचा गया यह रास्ता सत्ता द्वारा जनित हिंसा का प्रतिकार का मार्ग न बने तो बेहतर होगा। नक्सलवादी प्रतिहिंसा ने सत्ता पर दबाव तो बनाया है पर कोई सार्थक समाधान अभी तक नही प्राप्त कर पाई है। यहाँ प्रतिकार को एक जनतांत्रिक रुप देकर एक पब्लिक स्फेयर विकसित करना होगा, जिसमें ऐसी हिंसा के खिलाफ माहौल बने । जनतांत्रिक प्रतिकार का मतलब मात्र 5 वर्ष बाद चुनाव में ऐसी प्रवृत्तियों के खिलाफ वोट देना ही नही है वरन् सत्ता जनित हिंसा का दैनन्दिन एवं सतत जनतांत्रिक एवं राजनैतिक प्रतिकार ही समाज को भी बदल सकता है एवं सत्ता को भी।

5 Comments leave one →
  1. Ram Sharma permalink
    April 6, 2012 7:56 AM

    Badri Narayan, you have expressed my feelings. I wish I could comment in Hindi, but I do not know how to. My compliments to Shivam for this posting. Where are those who talk of revolution without context? They may not even read or understand what you are writing. They do not understand that revolution is not imposed, it just happens. They romaticise it without knowing where and how it comes from. Some of them are celebrating Mulayam’s victory, a Socialist’s victory, a Champion of minorities’s victory. In reality it is victory of lawlessness, it is victory of criminals and goondas. Dalits are dumb. They have no voice. Those who come out of the abject powerty, forget their past, forget where they came from. They become different. They have Dalit label, but not Dalit voice. It is sad and shocking that Hindi News Papers would not publish your article, although quite a few proclaim their socialistic leanings, which of course means nothing. A revolution is needed, not a violent one at this juncture, but may be Gandhian. Badri Narayan, if you happen to read my comment please stand up for justice, just by your self.. Donot look at Left or Right. There is no difference. I will follow you.

  2. kamal nayan choubey permalink
    April 8, 2012 9:54 PM

    बद्री नारायण द्वारा अपने लेख में समाजवादी पार्टी के समर्थकों द्वारा दलितों के खिलाफ की जा रही हिंसा का विश्लेषण सही है, लेकिन इस संदर्भ में सबसे मत्वपूर्ण सवाल यही है की हिंसा झेल रहे दलितों के पास क्या रास्ता है? शायद हथियार जुटाकर हिंसा करना एक रास्ता ना हो लेकिन एक सक्रिय एकजुटता की सख्त जरुरत है. बसपा की राजनीति ने चुनावों को ध्यान में रखकर दलितों को गोलबंद तो किया लेकिन वो जनांदोलन की कोई परम्परा का विकास नहीं कर पाई. बदकिस्मती से बहुत से दलित चिंतको ने चुनावी राजनीति को ही परमसत्य मान लिया है. शायद जरुरत इस बात की है की दलित एकजुट होकर अपने खिलाफ होने वाले हिंसा का प्रतिरोध करे. इस तरह के प्रतिरोध में अपनी जान और इज्जत की हिफाजत पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. जब राज्य, और जनतान्त्रिक रूप से चुनी गई सरकार इनके खिलाफ हिंसा को रोकने की करवाई नहीं करती है तो इन्हें अपनी हिफाजत करने के लिए खुद एकजुट होना होगा. इस तरह की एकजुटता ने बिहार में ताकतवर जातियों को दलितों के खिलाफ हिंसा करने से रोका- कई मर्तबा भाकपा (माले) की राजनीति में, उनके विरोधियों को हिंसा का डर दीखता था इसलिए वे दलितों के खिलाफ हिंसक कारवाई करने से डरते थे. लेकिन जैसा की बद्री खुद मानते हैं की जनतंत्र हिंसा से मुक्त नहीं हो पाया है तो फिर दलितों के लिए भी अपनी हिफाजत करने के लिए एकजुट होकर संघर्ष करना ही एकमात्र विकल्प है.

  3. badri narayan permalink
    April 15, 2012 12:58 PM

    dekhie n mayavati ji statues ke liye bol rahi hai par jo dalit yaha gaon aur kasbo me mare pite ja rahe hai hai unke lie ek shabd nahi.Kya human dignity,human life ka kimat nahi hai?

    • Kumarpushp permalink
      April 23, 2012 10:40 PM

      Kanshi Ram had told the dalits to sell your TV sets and buy arms.Dalits should buy arms to protect them self .

  4. JGN permalink
    April 15, 2012 9:41 PM

    What happened to the ‘Dalit-Queen”? Why she is not raising her voice for them?

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