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जेल डायरी: अरुण फेरेरा

July 2, 2012

Guest post by ARUN FERREIRA

Translated from English by Anil Mishra

नागपुर जेल की उच्च-सुरक्षित परिसीमा में स्थित अंडा बैरक बग़ैर खिड़कियों वाली कोठरियों का एक समूह है। अंडा के प्रवेश-द्वार से दूसरी अधिकतर अन्य कोठरियों में जाने के लिए लोहे के पाँच दरवाज़ों, [और पैदल] एक संकरा गलियारा पार करना होता है। अंडा के भीतर कई अलग अहाते हैं। हरेक अहाते में कुछ कोठरियाँ हैं, और हर पहली कोठरी दूसरी से सावधानीपूर्वक अलगाई गई है। कोठरियों में बहुत कम रोशनी होती है और आप यहाँ कोई पेड़ नहीं देख सकते। आप यहाँ से आसमान तक नहीं देख सकते हैं। मुख्य निगरानी टॉवर के ठीक ऊपर से अहाते में एक बड़ा भारी, ठोस अंडा हवा में लटकता रहता है। लेकिन इसमें (और अन्य अडों में) एक बड़ा फ़र्क़ है। इसे तोड़कर खोलना असंभव है। बल्कि, यह क़ैदियों (के हौसलों) को तोड़ने के लिए बनाया गया है।

 अंडा वो जगह है जहाँ सबसे ज़्यादा बेलगाम क़ैदियों को, अनुशासनात्मक क़ायदों के उल्लंघन करने की सज़ा के लिए क़ैद किया जाता है। नागपुर जेल के अन्य हिस्से इतने ज़्यादा सख़्त नहीं है। अधिकतर क़ैदी पंखे और टीवी वाली बैरकों में रखे जाते हैं। बैरकों में, दिन के पहर काफ़ी इत्मिनान वाले, यहाँ तक कि आरामतलब भी हो सकते हैं। लेकिन अंडा में, कोठरी के दरवाज़े ही हवा के आने जाने का एकमात्र ज़रिया है, और ये भी कुछ ख़ास आरामदायक नहीं, क्योंकि ये किसी खुले प्रांगण में नहीं, एक ढंके-मुंदे गलियारे में खुलता है।लेकिन अंडा के निर्मम, दमघोंटू माहौल से ज़्यादा मानव संपर्क की ग़ैरहाज़िरी सांस घोंटने वाली होती है। अंडा में, 15 घंटे या इससे ज़्यादा समय अपनी कोठरी में तन्हा गुज़ारना होता है। दिखाई देने वाले लोग सिर्फ़ सुरक्षाकर्मी और कभी कभार उस हिस्से में रह रहे अन्य क़ैदी होते हैं। अंडा में कुछेक हफ़्ते ही हौसलों की किरचें बिखेरने वाले हो सकते हैं। नागपुर जेल में क़ैदियों के बीच अंडा का ख़ौफ़ बख़ूबी ज्ञात है, और वे अंडा में निर्वासित होने की बजाय कठोर से कठोर पिटाई बर्दाश्त कर जाते हैं।

जबकि अधिकतर क़ैदी अंडा या इसके हमजोल, फांसी यार्ड (मौत की सज़ा पाए क़ैदियों के घर) में सिर्फ़ कुछ हफ़्ते रहते हैं, इन हिस्सों में मैंने चार साल आठ महीने बिताए। ऐसा इसलिए क्योंकि मैं कोई साधारण क़ैदी नहीं था। पुलिस के दावे के अनुसार, मैं एक ‘ख़ूखार नक्सलवादी’, ‘माओवादी नेता’ था। 8 मई 2007 को मुझे गिरफ़्तार करने के बाद, सुबह-सुबह अख़बारों में यही विवरण प्रकाशित कराए गए थे।

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 गर्मियों की एक चिलचिलाती दोपहरी में मुझे नागपुर रेलवे स्टेशन से गिरफ़्तार किया गया था। मैं कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं से मिलने का इंतज़ार कर रहा थाजब तक़रीबन 15 आदमियों ने मुझे जकड़ लिया, कार में धकेला और रास्ते भर मुझे मारते-पीटते तेज़ी से कार कहीं दूर भगा ले गए। वे मुझे एक इमारत के एक कमरे में ले गए, मेरे अपहरणकर्ताओं ने बाद में बताया कि यह नागपुर जिमख़ाना था। मेरे हाथ बांधने के लिए उन्होंने मेरे बेल्ट का इस्तेमाल किया और मेरी आँखों पर पट्टी बांध दी गई, ताकि इस प्रक्रिया में शामिल पुलिस अधिकारी अनचीन्हे ही बने रहें। उनकी बातचीत से मालूम हो रहा था कि नागपुर पुलिस के नक्सल-विरोधी दस्ते ने मुझे हिरासत में लिया है। हमले कभी नहीं थमे। पूरे दिन मुझे बेल्ट, घूंसों और जूते से पीटा जाता रहा। आगे की पूछताछ मेरा इंतज़ार जो कर रही थी।

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 नब्बे के दशक की शुरुआत में मुंबई के सेंट ज़ेवियर कॉलेज में पढ़ाई के दौरान सामाजिक सक्रियता से मेरा पहला वास्ता पड़ा। जहाँ मैंने अधिकारविहीन लोगों के लिए गाँवों में शिविर और कुछ कल्याणकारी परियोजनाओं का आयोजन किया था। 1992-93 के धार्मिक दंगों ने मुझे झकझोर कर रख दिया। हज़ारों मुसलमान ख़ुद अपने शहर से बेदख़ल कर दिए गए थे। हमने कुछ सहायता शिविर संचालित की थी। राज्य की क्रूर उपेक्षा ने शिवसेना द्वारा सामूहिक हत्याकांडों को बग़ैर किसी रोक-टोक के अंजाम होने दिया था। मैं जल्द ही, लोकतांत्रिक और समतामूलक समाज बनाने के उद्देश्य में लगे एक छात्र संगठन, विद्यार्थी प्रगति संगठन से जुड़ गया था। ग्रामीण इलाक़ों में हमने बेदख़ल कर दिए गए लोगों को उनके हक़-अधिकारों को वापस दिलाने में मदद के लिए कई अभियान संगठित किए। नाशिक में, वन विभाग की ज़्यादतियों के ख़िलाफ़ आदिवासी ख़ुद को संगठित कर रहे थे। दाभोल में, ग्रामीण एनरॉन उर्जा परियोजना का प्रतिरोध कर रहे थे। गुजरात के उमरगाँव में, मछलियाँ पालने वाले लोग एक दैत्याकार पत्तन से अपने भयानक विस्थापन के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे थे। इन संघर्षों को काफ़ी क़रीब से देखने समझने से मुझे भान हुआ कि ग़रीबों को राहत दिलाना उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि उन्हें सत्ता और न्याय के तोड़े-मरोड़े संबंधों के बारे में सवाल करने और उनके अधिकारों की दावेदारी में संगठित करने में मदद करना है।

 हालाँकि, 9/11 के पश्चात, जन-आंदोलनों को ग्रहण करने के तौर-तरीक़ों में एक तब्दीली आई। तथाकथित आतंक के ख़िलाफ़ युद्ध ने राज्य की नीतियों का बुनियादी अभिप्राय सुरक्षा को बना दिया था। भारत में, असुविधाजनक सवालों को दबाने के लिए विशेष क़ानून अपनाए जाने लगे। संगठनों पर पाबंदियाँ लगा दी गईं, मतों का अपराधीकरण कर दिया गया और सामाजिक आंदोलनों पर ‘आतंकी’ का ठप्पा लगाया जाने लगा। हममें से जो लोग ग्रामीण इलाक़ों में आदिवासियों या शोषितों को संगठित करने के लिए काम करते रहे उन्हें ‘माओवादी’ ठहराया जाने लगा था।

2005 में, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने घोषित किया कि माओवादी “भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा” हैं। कईयों को ‘मुठभेड़’ में मार या ‘ग़ायब’ कर दिया गया, जबकि अन्य लोगों को गिरफ़्तार किया जाने लगा। छत्तीसगढ़, झारखंड या महाराष्ट्र के विदर्भ जैसे इलाक़ों में सभी ग़ैर-पार्टी (नॉन पार्टीज़न) राजनीतिक गतिविधियों पर ‘माओवाद’ का ठप्पा लगाया गया, और तदनुसार निपटा जाने लगा। मेरी हिरासत के पहले, अंबेडकरवादी आंदोलन को नक्सलवादी राजनीति के ज़रिए भड़काने के आरोप में नागपुर में कई दलित कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया गया था। इन सबका मतलब यह था कि मैं अपनी गिरफ़्तारी के लिए पूरी तरह से बिना किसी तैयारी के नहीं था।

इस परिकल्पनात्मक स्थिति के अवलोकन के बावजूद, मैं [राज्य] के हमले का निशाना बन जाने—गिरफ़्तारी, यातनाओं, गढ़े सबूतों के आधार पर झूठे मामलों में फंसाए जाने, और कई सालों के लिए जेल में बंद कर दिए जाने के लिए सचमुच तैयार नहीं था।

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 आधी रात को, हिरासत में लिए जाने के 11 घंटों बाद, मुझे पुलिस थाने ले जाया गया और बताया गया कि ग़ैरक़ानूनी गतिविधि निवारक अधिनियम, 2004 के मुझे अंतर्गत गिरफ़्तार किया गया है, जो कि उन लोगों पर लगाया जाता है जिनके बारे में राज्य मानता है कि वे आतंकवादी हैं। वह रात मैंने पुलिस थाने की एक गीली, अंधेरी कोठरी में गुज़ारी। एक गंध मारता काला कंबल मेरा बिस्तर था। इसका रंग बमुश्किल ही बता पाता था कि यह कितना गंदा है। ज़मीन पर एक छेद था, जो चारों तरफ़ पान की पीकों और अपनी तीखी बदबू से पहचाना जा सकता था कि यह मूत्रालय है। अंततः मुझे भोजन परोसा गया: दाल, रोटी और गालियाँ। [दिन के] मुक्कों से दुखते जबड़े से प्लास्टिक थैली में खाना खाना आसान नहीं था। लेकिन दिन के ख़ौफ़ों के बाद ये तक़लीफ़ें अपेक्षाकृत महत्वहीन थीं, और इन्होंने मुझे ख़ुद को अपने क़रीब खींचने का छोटा सा मौक़ा दिया। मैंने सड़े बिस्तर और गीली बदबू को नज़रअंदाज़ करने का प्रबंध किया और झपकी लेने लगा।

कुछ ही घंटों के भीतर, मैं अन्य पाली के पूछताछ के लिए जग गया। वह अधिकारी पहले-पहल तो कुछ नरमाई से पेश आया लेकिन वे जो चाहते थे उसके जवाब लेने की कोशिश में जल्दी ही लात-घूंसों की बौछार शुरू कर दी। वे मुझसे हथियारों और विस्फोटकों के ठिकानों और माओवादियों के साथ मेरे संबंधों की जानकारियाँ चाह रहे थे। अपनी मांगों के लिए मुझे और भेद्य बनाने के लिए उन्होंने [कुचलने वाली] मध्ययुगीन यातना तकनीकी के एक नवीनतम संस्करण का इस्तेमाल करते हुए मेरे समूचे शरीर को पूरी तरह मरोड़ दिया। मेरे हाथ बहुत ऊँचाई पर एक खिड़की से बाँध दिए गए, और मुझे ज़मीन से सटाने के लिए दो पुलिसवाले मेरे ऐंठे हुए तलवों पर चढ़ गए। इसका हिसाब-किताब दिखाई दे जाने वाले किन्हीं घावों के बग़ैर अधिकतम दर्द पहुँचाना था। उनके सावधानियाँ बरतने के बावजूद, मेरे कान से ख़ून रिसने लगा और मेरे जबड़े फूलने लगे।

शाम में, मुझे काले नक़ाब पहनाकर ज़मीन पर उकड़ूँ बैठाकर मेरे पीछे कई अधिकारियों ने खड़े होकर प्रेस के लिए तस्वीरे खिंचाई। अगले दिन, बाद में मुझे मालूम हुआ कि, ये तस्वीरें देश के विभिन्न अख़बारों के पहले पन्ने की सुर्खियाँ बनीं। प्रेस से कहा गया कि मैं नक्सलवादियों के एक अति-वामपंथी धड़े का प्रचार और संचार प्रमुख था।

फिर मुझे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। जैसा कि क़ानून के सारे विद्यार्थी जानते हैं कि [क़ानूनी प्रक्रिया में] यह चरण क़ैदी को हिरासत में दी गई यातनाओं की शिकायत का एक मौक़ा देने के लिए होता है—जिसे कि मैं बड़ी आसानी से स्थापित कर सकता था क्योंकि मेरा चेहरा सूजा हुआ था, कान से ख़ून रिस रहा था और तलवों में ऐसे घाव हो गए थे कि चलना असंभव लग रहा था। लेकिन अदालत में, मुझे अपने वकील से पता चला कि, पुलिस ने पहले ही मेरी गिरफ़्तारी की गढ़ी गई कहानी में उन ज़ख़्मों के बारे में झूठ गढ़ लिए थे। उनके संस्करण के मुताबिक़, मैं एक ख़तरनाक आतंकवादी था और गिरफ़्तारी से बचने की कोशिश में पुलिस से काफ़ी लड़ाई लड़ी। उन्होंने दावा किया कि मुझे दबोचने के लिए उनके पास ताक़त के इस्तेमाल के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। अजीब था कि मुझे बंदी बनाने वालों में से किसी को हाथापाई के दौरान कोई नुक़सान नहीं हुआ था।

हैरानी की एक मात्र यही बात नहीं थी। अदालत में, पुलिस ने कहा कि मुझे तीन अन्य लोगों—एक स्थानीय पत्रकार धनेन्द्र भुरले, अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के गोंदिया जिला-अध्यक्ष नरेश बंसोड़; और आंध्रप्रदेश के निवासी अशोक रेड्डी के साथ गिरफ़्तार किया है। पुलिस का दावा था कि उन्होंने हमारे पास से एक पिस्टल और ज़िंदा कारतूस बरामद किए हैं। उन्होंने कहा कि हम नागपुर के दीक्षाभूमि के स्मारक को उड़ाने की योजना की साज़िश रच रहे थे। पुलिस अगर लोगों को इस बात से सहमत कर लेती थी कि हमारी योजना इस पवित्र स्थल पर हमले की थी तो वह दलितों को वामपंथियों से कोई ताल्लुक नहीं रखने के लिए सहमत कर लेगी।

लेकिन महज आरोप काफ़ी नहीं थे। उन्हें अपने दावों के समर्थन में सबूत की ज़रूरत थी। पुलिस ने अदालत से कहा कि पूछताछ के लिए उन्हें 12 दिनों के लिए हमारी हिरासत की ज़रूरत है। उस पत्रकार को और मुझे नागपुर के सीताबर्डी पुलिस थाने में रखा गया था, जबकि दो अन्य लोगों को धंतोली थाने ले जाया गया। हर सुबह, हमें लगातार चलने वाली पूछताछ के लिए पुलिस जिमख़ाने ले जाया जाता था, जो देर रात तक चलती थी। पहले, वे अपने तैयार किए हुए एक इक़बालिए बयान पर दस्तख़त करने के लिए हम पर दबाव डालते रहे। जब वे इसमें नाकाम हो गए तो उन्होंने अदालत को वैज्ञानिक तौर पर संदेहास्पद पद्धति नार्को एनालिसिस, लाई डिटेक्टर, और ब्रेन मैपिंग की अनुमति के लिए राजी कर लिया, जिसके बारे में उन्हें उम्मीद थी कि यह उनके आरोपों के लिए सुरक्षा-कवच का काम करेगा। तो, हलांकि, मैं क़ानूनन उनकी हिरासत में नहीं था लेकिन पुलिस इन फ़ोरेंसिक परीक्षणों के बहाने मुझसे अभी भी यातनादेह पूछताछ कर रही थी। हमें मुंबई स्थित राज्य फ़ोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला ले जाने की तैयारियाँ की जाने लगीं।

उसके पहले, नागपुर केंद्रीय कारागार में हमें औपचारिक तौर से दाख़िल किया गया। मुझे अहाते के एक छोटे संकरे दरवाज़े पर रोका गया जिसे 54 महीनों के लिए मेरा घर होना था। प्रक्रिया के अनुसार, पहली बार प्रवेश कर रहे क़ैदियों को दरवाज़े पर तैनात अफ़सर (गेट ऑफ़िसर) के सामने पेश किया जाता है। परंपरा, और संभवतः प्रशिक्षण, की अपेक्षा होती है कि यहाँ तक कि सबसे मृदुल-स्वभाव के अफ़सर को भी नए प्रवेशकों, जिन्हें जेल की बोली में ‘नया अहमद’ कहते हैं, से निपटने में जितना ज़्यादा हो सके उतना ज़्यादा हमलावर होना चाहिए। यह दरवाज़े पर तैनात अफ़सर का काम होता है कि वह नए आने वाले लोगों को दब्बूपने, बुद्धिहीनता और चापलूसी के संक्षिप्त गुर सिखाए।

अफ़सर को यह पूछताछ भी करनी होती है कि पुलिस हिरासत में यातनाओं के कारण नए क़ैदी कहीं चोटों से तो नहीं पीड़ित हैं, और अगर ऐसा है तो उसके बयान दर्ज़ करना होता है। मेरे मामले में, मेरे कानों से ख़ून रिस रहा था, थोबड़े सूजे हुए थे और पाँव ज़ख़्मी थे। लेकिन हक़ीक़त में, जिस किसी ने शिकायत करने की कोशिश की, अफ़सर ने उसे धमकाया। रिवाज़ के मुताबिक़, सारे ज़ख़्मों को यह कहकर दर्ज़ किया जाता है कि वे क़ैदी के गिरफ़्तार होने से पहले उसके शरीर में मौजूद थे। जेल में नए प्रवेशकों की तलाशी का एक स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल होता है। मुझसे मेरे भीतरी कपड़े तक उतरवा लिए गए और जड़ती अमलदार (तलाशी का प्रभारी आदमी) को तलाशी देने के लिए अपनी बारी का इंतज़ार करने के लिए अन्य नए प्रवेशकों के साथ बैठने का आदेश दिया गया। हमारे सारे सामान की छानबीन की गई और फिर हमारे द्वारा उन्हें विनम्रता पूर्वक दुबारा उठाने के लिए गंदे रास्ते पर फेंक दिया गया। बिस्किट और बीड़ी जैसी ख़तरनाक चीज़ों से कर्मचारियों ने ख़ुद अपनी जेबें गरम कर लीं।

हम बदनसीब थे कि जेल में अलग से आए, लेकिन संयोग से अगर कोई क़ैदी किसी वरिष्ठ जेल अफ़सरों के आने या जाने के समय दरवाज़े पर तलाशी का इंतज़ार कर रहा है तो वह औपनिवेशिक कालीन समारोह का गवाह बनने का विशेषाधिकारी होता है। वरिष्ठ जेलर और अधीक्षक से दरवाज़े से घुसने के लिए नीचे झुकने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। अतः इन साहबों को सिर ऊँचा ताने गुज़रने के लिए मुख्य दरवाज़ा झूलते हुए खुलेगा। जब वे दूर से ही दिख जाते हैं तो दरवाज़े पर तैनात सुरक्षाकर्मी चेतावनी का फ़रमान चीख़ेगा: “सावधान सभी!” सारे कर्मचारी सावधान मुद्रा में खड़े हो जाएँगे और सभी छोटी, मामूली ज़िंदगियाँ निगाहों से दूर कोनों में दुबक जाएँगी या (नहीं छुपने पर) उनकी पीठों और पिछवाड़ों पर लात-घूसों की बौछारें शुरू हो जाएँगी।

अधिकतर नए अहमदों को फिर एक दरवाज़े से सटी बैरक में ले जाया जाता है, जहाँ उन्हें किसी निर्धारित बैरक में भेजे जाने से पहले एक या दो रातें गुज़ारनी होती है। इंतज़ार का यह दौर जेल कर्मचारियों, सज़ायाफ़्ता वार्डरों, भीतरी लुटेरों के गैंगों और अन्य हमलावरों को नवीनतम गिरफ़्त में आए व्यक्ति से, वे जो कुछ लूट-खसोट सकते हैं वह लूटने की अनुमति देता है। मध्य और ऊच्च वर्ग के प्रवेशक आसान निशाना होते हैं। उन्हें जेल-ज़िंदगी के ख़ौफ़ों की काली कहानियों से और धमकियों को-ज़ाहिर--करने के लिए पुचकारा जाता है। नौजवान लड़के मुफ़्त श्रम का और बतौर यौन खिलौना निशाना बनते हैं। संपर्क बनाए जाते हैं और नियमित बैरक में जाने पर बढ़िया सुविधाएँ सुनिश्चित करने के लिए सौदेबाज़ी की जाती है।

अगला चरण मुलाइजा या छानबीन-की-प्रक्रिया होती है। नए क़ैदियों को किसी सज़ायाफ़्ता वार्डर या जेलर द्वारा जेल अनुशासन के मूल्यों पर भाषण पिलाया जाता है। हर क़ैदी के पहचान-चिह्न को दर्ज़ किया जाता है और अधीक्षक के नेतृत्व वाले जेल-देवताओं के जत्थे के सामने पेश करने से पहले उनकी तौल, माप ली जाती है और एक डॉक्टर और मनोवैज्ञानिक द्वारा उनका परीक्षण किया जाता है। हर क़ैदी को शरीर में लटकाए रखने के लिए एक तमग़ा दिया जाता है जिसमें उसका क़ैदी नंबर और उसके ख़िलाफ़ दर्ज़ मामलों की सूची होती है। अपराध का वर्गीकरण कैसे किया जाएगा, और जेल में उसके साथ, कुछ हद तक, कैसे सलूक किए जाएँगे, ये तमग़ा इस बारे में आधार निर्मित करते हैं।

क़ानून की घोषणा, कि आरोपी व्यक्ति तब तक निर्दोष होता है जब तक कि वह दोषी साबित न हो, के बावजूद क़ैदख़ाने की दीवारों के पीछे इन सुविचारों का कोई अर्थ नहीं होता। जेल अधिकारियों के लिए पुलिस के आरोप ही, मुक़दमे का इंतज़ार कर रहे लोगों को, सज़ा देने का पर्याप्त सबूत होते हैं। कथित बलात्कारी और होमोसेक्सुअल्स, जेल कर्मचारियों के प्रोत्साहन पर अन्य क़ैदियों और अधिकारियों के हमलों का निशाना बनते हैं। हत्या के आरोप में बंद लोगों को सज़ायाफ़्ता के यूनीफ़ॉर्म पहनने को विवश किया जाता है और उन्हें एक विशेष ‘हत्या बैरक’ में डाल दिया जाता है। अपनी देशक्भक्ति प्रदर्शित करने के लिए, कई जेल अधीक्षक व्यक्तिगत तौर पर आतंकवाद के आरोपी लोगों की पिटाई करते हैं।

मुलाइजा के पहले, प्रक्रिया के अनुसार नए प्रवेशकों को नहाना होता है। हालाँकि, साबुन और पानी की कमी इस नियम की महत्वपूर्ण प्रथा का उल्लंघन करती है। एवज़ में, अधिकतर नए अहमद नाई कमान के हाथों तुरत-फुरत-तैयार होने के लिए भागदौड़ करते हैं। नाई कमान क़ैदियों के एक समूह से ही बनती है। नए अहमदों का अगला विरामस्थल बड़ी गोल होता है। यह नागपुर जेल का वह क्षेत्र है जहाँ मुक़दमे का इंतज़ार कर रहे क़ैदी रहते हैं। प्रत्येक के लिए एक बैरक निर्धारित कर दी जाती है। सैद्धांतिक तौर पर, यही वह जगह है जिधर मुझे जाना था। लेकिन मेरे मामले में, सारी प्रक्रियाएँ भाड़ में झोंक दी गईं। पुलिस द्वारा उठाए जाने के बारह दिनों बाद, जल्दबाज़ी से मुझे अंडा बैरक में डाल दिया गया, क़ैदियों वाला लिबास दिया गया, और शाम 4 बजे खाने के लिए बेसन और रूखी-सूखी रोटियाँ देने के बाद मुंबई के लिए ट्रेन में बैठा दिया गया।

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फिर नार्को-टेस्ट से पहले (हिरासत में लिए गए व्यक्ति के) कई मेडिकल परीक्षण होते हैं। प्रत्यक्षतः तो यह परीक्षण यह पता लगाने के लिए होते हैं कि वे इन फ़ोरेंसिक प्रक्रियाओं से गुज़रने के लिए स्वस्थ हैं कि नहीं। हक़ीक़त में, ये परीक्षण क़ैदी के प्रतिरोधक स्तरों को तय करते हैं और अधिकारियों को ये हिसाब लगाने में मदद करते हैं कि आरोपी को पूरी तरह से नष्ट किए बग़ैर उसके शरीर में कितनी मात्रा में ड्रग, सोडियम पेंटोथाल, डाला जा सकता है। ये नार्को परीक्षण मुंबई के जेजे के ऑपरेशन थियेटर, सर्जरी सुविधा के बैकअप वाले एक सरकारी अस्पताल, में किए गए। यह इसलिए क्योंकि सोडियम पेंटोथाल हृदय-गति को—घातक तौर पर—धीमा कर सकता है।

ड्रग एक-एक बूँद, नियंत्रित गति से डाला जा रहा था ताकि मैं (एक लंबे) समय के लिए अर्ध-बेहोश रहा आऊँ। फ़ोरेंसिक मनोवैज्ञानिक ने सवाल पूछना शुरू किया और बातचीत की वीडियो रिकॉर्डिंग हो रही थी। हालाँकि, पुलिस को प्रयोगशाला में घुसने की इजाज़त नहीं थी, लेकिन फ़ोरेंसिक विशेषज्ञ ख़ुद--ख़ुद पुलिसिया क्षमता से, मेडिकल मूल्यों का अनादर करते हुए और मेरे स्वास्थ्य को पूरी तरह ठेंगा दिखाते हुए, ड्रग का इस्तेमाल कर रहे थे। पुलिस ने मनोवैज्ञानिक के लिए मुझसे पूछे जाने सवालों की सूची तैयार की थी: कि मैंने हथियार और विस्फोटक कहाँ रखे हैं, कि क्या मैं संदेहास्पद संगठनों या लोगों से जुड़ा हुआ था। उनमें से कुछ सवाल मुझे बाद में याद आए। यह जगने के बाद कुछ कुछ सपने को याद करने जैसा था। सारे विवरणों को एकदम सटीक तौर पर मैं नहीं याद कर पाया, लेकिन मोटी मोटी बातों को मैं नहीं भूला।

लौटने के एक हफ़्ते बाद, मैं नक्सल हिंसा में शामिल होने के अन्य पाँच मामलों में फंसा दिया गया। पुलिस को अन्य बीस दिनों की हिरासत मिल गई। इसका मतलब था कि मैं गोंदिया जिले के पुलिस थाने में फिर पुलिस के हाथों सुपुर्द कर दिया गया। यह सुपुर्दगी और अधिक नींद हराम करने के लिए, और अधिक यातना देने तथा और अधिक पूछताछ के लिए थी। मैं ख़ुशक़िस्मत था कि अपेक्षाकृत कम में ही छूट गया। मेरे दो सह-आरोपियों के गुदा में पुलिस ने पेट्रोल डाल दिया, नतीजतन कई दिनों तक उनके गुदा से ख़ून बहता रहा। उन्होंने मेरे शरीर की नस नस मरोड़ी, चौड़ी पट्टी के बेल्ट, महाराष्ट्र पुलिस दुलार से जिसे “बाजीराव” कहती है, से कोड़े लगाए, और मेरे जबड़े तोड़ दिए।

अब तक, मुंबई के नार्को-एनालिसिस परीक्षणों के नतीजे आ गए थे। पुलिस मामले के लिए वे कुछ वज़नदार चीज़ पाने में नाकाम हुए, अतः अधिकारियों ने बंगलौर की प्रयोगशाला से अन्य चरण के परीक्षण कराने के लिए अदालत से गुपचुप आदेश हासिल कर लिए। यहाँ के परीक्षण शातिर एस. मालिनी द्वारा किए गए, जिसे बाद में, जब यह पाया गया कि उसने काम पाने के लिए झूठे काग़ज़ात जमा किए थे, तो नौकरी से बर्ख़ास्त कर दिया गया। मालिनी को समूचे भारत में पुलिस बल ख़ूब आदर-भाव देता था। उसका दावा था कि उसने 2006 के मालेगांव धमाके, मक्का मस्जिद धमाके, और सिस्टर अभया के मामले की गुत्थी सुलझा दी है। बरसों बाद, यह प्रमाणित हुआ कि इन सभी मामलों की ग़लत जाँच की गई थी। नार्को के दौरान उसने मुझे चांटे मारे और गालियाँ दीं, मेरे कान में चिमटियाँ चुभोई, और मुझे और मेरे सह-आरोपी को बेहोश नहीं होने देने के लिए उसने बिजली के झटके तक दिए।

लेकिन यह भी कुछ ख़ास काम नहीं आया। अतः पुलिस ने मुझे दो और मामलों में फंसा दिया। उन्होंने मुझसे दो हफ़्ते और यातनादेह पूछताछ की। गिरफ़्तारी के बाद का मेरा पहला साल ऐसे पूरा हुआ। पुलिस मुझे नए मामलों में फंसाती रही, पूछताछ के लिए पुलिस हिरासत हासिल करती रही, मुझ पर यातना के भयानक तरीक़े आज़माती रही। इक़बालिया बयान हासिल करने में नाकाम रही। और अन्य मामले में सिर्फ़ फंसाने के लिए मुझे जेल वापस भेज देती। जब इन मामलों में पुलिस ने अंततः आरोप-पत्र दाख़िल किए सिर्फ़ तभी मेरी एक नई दिनचर्या शुरू हुई। इनमें से एक ये थी कि इन मामलों की सुनवाई के इंतज़ार में मुझे हफ़्ते या कई बार रोज़ाना अदालत के चक्कर लगाना होता था। अब मेरे पास ये सुविधा थी कि मैं जेल की ज़िंदगी के रागों को क़रीब से सुन सकता था।

जेल की सुबह टंकी या हौज़ के लिए पागलपन भरी आपा-धापी लेकर आती थी। 603 फ़िट के हौज़ के किनारे नहाने वाले चार सौ लोग खड़े होते थे, मतलब कि ठीक ठाक समय में भी उन्हें जल्दी-जल्दी पानी भर उलीचना होता था। गर्मियों में, जब कुएँ का पानी ख़त्म हो जाता और यह लगभग सूख जाता तो यह आपा-धापी और तेज़ हो जाती थी। जेल-विद्या लोगों को यह बताती थी कि कौन पर्याप्त तेज़ नहीं है, और कि बाजू वाले के शरीर से चू रही बूंदों से (अपने शरीर का) साबुन धोना होता है। दांतों की सफ़ाई, नहाना, और जांघिया धोना, ये सब कुल 10 मिनट के भीतर करना होता था, वरना किसी की नियति हौज़ की तलछटी में हाथ ही फेरते रहने की हो सकती थी।

पैख़ाने और नहाने के लिए सुबह की भीड़ से मोल-भाव करने में सिर्फ़ तेज़ी ही नहीं, अक़्ल की भी ज़रूरत पड़ती है। यह ख़ासतौर से उन बैरकों के लिए महत्वपूर्ण होता है जिनमें अंडरट्रायल्स की बड़ी संख्या हो, और जिन्हें अदालत में हाज़िर होने के लिए जल्दी तैयार होना होता है। दो घंटे से भी कम समय में, 6.45 पर बैरक के खुलने से लेकर और अदालत में 8.30 बजे तक हाज़िर होने तक, उन्हें न सिर्फ़ नहाना और पूरी तरह तैयार होना होता था बल्कि हाज़िरी के लिए पंक्ति में खड़ा होना पड़ता था, और तब 7 बजे चाय लेनी होती थी, 7.30 बजे नाश्ता करना होता था, और 8 से 8.30 के बीच दोपहर का खाना खाना होता था।

नाश्ते लेने के महज आधे घंटे के भीतर दोपहर का खाना खाने के बेतुकेपन से तालमेल बिठाना मेरे शरीर के लिए कत्तई आसान न था। जल्दी खाना देना, जैसा कि अन्य जेलों में भी था, बिल्कुल क्रूर उपेक्षा का नतीजा था। अंडरट्रायल्स का सुबह 8.30 बजे से शाम 6.30 बजे तक का समय अक्सर अदालत के रास्ते में, अदालत में, और वापस जेल आने में बीतता है, लेकिन जेल के अफ़सरान उनके लिए बाद में दोपहर को खाने के लिए खाना पैक कराना उचित नहीं समझते हैं। उच्च न्यायालय के आदेश कि ऐसा किया जाना चाहिए की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। लेकिन जब से जेल की नियम-संहिता, जो कि जेल की सारी गतिविधियों को दिशा-निर्देश देता है, में यह ज़िक्र हुआ कि क़ैदियों को क्या खाने दिए जाने चाहिए तो अफ़सरान अंडरट्रायल्स को दोपहर का खाना सुबह 8 बजे बाँटकर अपनी ख़ानापूर्ति कर लेते हैं। लेकिन कम संसाधनों के पीछे भागने वाले कई सैकड़े लोगों में से जब आप एक होते हैं, तो सामान्यतः कुछ चीज़े आप तक आते आते चुक ही जाती हैं—या तो आप शौच कर पाएँगे या नहा पाएँगे, या तो नाश्ता कर पाएँगे या फिर दोपहर का खाना।

खाने का बँटवारा ऊर्जावाना तापा कमान द्वारा किया जाता है। यह क़ैदियों के कई समूहों में से एक कमान है जो जेल को कार्यरत रखने में एक अहम भूमिका निभाती है। तापा कमान सुबह 6.45 पर बैरक खुलने से लेकर, 5 बजे, अपने बाड़े में बंद किए जाने तक, खाने के बड़े-बड़े बर्तनों—तापाओं, जिससे कि उन्हें यह नाम दिया गया है, को लेकर इधर-उधर भागते हुए काफ़ी व्यस्त रहते हैं। अपने बचे हुए हिस्सों की मांग करते दो हज़ार पेट एक तनाव भरे लम्हे पैदा पर सकते हैं, और तापा श्रमिक काफ़ी जल्दी में होते हैं। वे सुनिश्चित करते हैं कि नियमावली में निर्धारित प्रत्येक सामग्री समुचित मात्रा में हर बैरक तक पहुँचे और सुबह की गिनती में मौजूद हर क़ैदी को निश्चित निर्धारित मात्रा में मिले।

इस काई के भीतर, तापा कमांडर का पद काफ़ी फ़ायदे का सौदा हो सकता है। कमांडर सामान्यतः एक सज़ायाफ़्ता वार्डर, एक लंबे समय से कार्यरत क़ैदी होता है जिसे अन्य श्रमिक क़ैदियों पर निगरानी रखने का काम दिया गया होता है। इसके लिए उसे 35 रुपए रोज़ाना का भुगतान किया जाता है। लेकिन वह अपने नियंत्रण के संसाधनों को बेचकर बाजू से अच्छी ख़ासी रक़म वसूल कर सकता है। बँटवारे में हेर-फेर कर, चीज़ों को खुले बाज़ार में बेचकर वह एक अतिरिक्त मूल्य संचित कर लेता है। जो भाई उसे पैसे देते हैं उन्हें अच्छा और ज़्यादा खाना मिलता है। लेकिन जेल-अधिकारियों और जेल की रसोई के लिए राशन आपूर्ति करने वाले ठेकेदारों के बीच होने वाले समझौतों के आगे तापा कमांडर के विशेषाधिकार फीके पड़ जाते हैं। जेल के कई कर्मचारी जेल आपूर्तियों से चीज़ें अपने परिवार का पेट भरने के लिए अपने घर ले जाने में सक्षम होते हैं। ऐसी चोरियों का नतीजा क़ैदियों को परोसे जाने वाले भोजन में कटौती होती है। जेल-संहिता में निर्देशित वज़न शर्तों को पूरा करने के सब्ज़ियों के सबसे सड़े-गले भाग तक क़ैदियों की थाली में जगह पाते हैं—इसमें यहाँ तक कि वह रस्सी भी शामिल होती है, जिससे आपूर्ति करने वाले लोग सब्ज़ियाँ बाँधते हैं।

परिणामतः, हमने अक्सर स्थितियों को बेहतर बनाने की कोशिशें की। इसका एक तरीक़ा खाने को जेल-कैंटीन से ख़रीदे हुए मिर्च-लहसुन के पॉवडर और अचार-मसालों से दुबारा पकाने का था। इसे हांडी की प्रक्रिया कहते थे। अल्युमिनियम की थाली को खाना बनाने के बर्तन की तरह इस्तेमाल किया जाता। ईंटों के सहारे या अल्युनिमियम के अन्य बर्तन से चूल्हा बनाया जाता। ईंधन के लिए अख़बारों और सूखी रोटी के टुकड़ों का इस्तेमाल किया जाता, लेकिन कई बार प्लास्टिक के टुकड़े, टहनियाँ, पुराने कपड़े, जेल से चुराए गए बिस्तर और यहाँ तक कि क़ानूनी काग़ज़ातों की कॉपियाँ भी आग के हवाले कर दी जातीं।

हांडी’ शब्द का इस्तेमाल क़ैदियों के उस समूह के लिए भी किया जाता था जो साथ-साथ अपना भोजन करते थे। वे कैंटीन से ख़रीदी गई चीज़ों को आपस में बाँट लेते थे और अन्य बातों से बेफ़िक़्र रहते थे। बैरक में, हांडी समूह के सभी सदस्य एक ही जगह पर सोते थे। हालाँकि, कोठरी में मेरे जैसे आदमी के लिए हांडी समूह [में शामिल होना] संभव नहीं था—हमें अपनी कोठरी में अकेले बंद कर दिया जाता था, अतः हम रात का खाना साथ में नहीं खा सकते थे। फिर भी, हमने ऐसा तरीक़ा ईजाद किया कि एक कोठरी में बनाया गया खाना दूसरी कोठरियों तक पहुँचाया जा सके। एक रणनीति के ज़रिए इसका प्रबंधन किया गया, जिसे गाड़ी कहा जाता था। कपड़े के टुकड़ों पर खाना रखा जाता था और ज़मीन के सहारे कपड़े को खिसकाते हुए, सूती से बने स्लेज़ के जैसे, एक कोठरी से दूसरी कोठरी में खींचा लिया था।

मांसाहार भोजन पर महाराष्ट्र सरकार की लगभग संपूर्ण पाबंदी भी क़ैदियों के गुणों और दक्षता को चुनौती देती है। गिलहरियों, पक्षियों, छुछूंदरों को फांसने, उनका शिकार करने और इसी क़िस्म के अन्य छोटे खेल एक गंभीर पेशा होते हैं। यहाँ तक कि टिड्डे और जेल में कभी कभार झुंड के झुंड आने वाले अन्य कीड़े भी इकट्ठे किए जाते और उन्हें धूप में भूनकर खाया जाता या चटनी बनाई जाती थी। कई बार पक्षियों को फांसने के लिए कपड़े की जालियाँ काम आती थीं। लोग गुलेल भी बनाते थे। वे निकास नालियों और अन्य निकासों में लगाए गए जालों से कई बार छुछूंदर को फांस लेते। लेकिन गिलहरी और चूहे, दोनों के लिए सबसे लोकप्रिय तरीक़ा हाथ-और-छड़ी से शिकार का होता था। अगर किसी एक ने देखा, तो सभी को चिल्लाते हुए आवाज़ दी जाती और शिकारी शिकार को किनारे लगा देते।

एक मोटी तगड़ी छुछूंदर— जो स्वाद में सुअर के मांस जैसे लगती है—मांस खाने वाले एक समूह के लिए अच्छी-ख़ासी दावत होती थी। जल्दी ही इसके बाल साफ़ किए जाते, काटा जाता और जेल कर्मचारियों और उनके मुख़बिरों की आँखों से दूर किसी कोने में पकाया जाता था। शौचालय के पीछे की जगह सुरक्षित मानी जाती थी। शौचालय साफ़ करने वाले डंडा कमान की देखरेख में यह सब किया जाता था, जो कि सर्वाहारी और शिकार को दौड़ाने और पकड़ने, दोनों में एक उत्साही भागीदार होते थे। ये दल जब भोज के लिए घेरे में बैठता, तो बातचीत अच्छे वक़्त की ओर मुड़ जाती थी। कोई जंगली सुअर की बात करता तो कोई ख़रगोश को याद करता। तब ऊँची दीवारें और लोहे की सलाखें पीछे छूटती हुई नज़र आती थीं। चीज़ें इतनी बुरी नहीं थीं, जितना कि वे दिखती थीं।

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हर बैरक का अपना एक भाई होता था, कमज़ोर लोग जिसके क़रीब होने का दावा करते या या चाहत रखते थे। जो लोग सफल हो जाते वे, एक जोड़ी बिस्तर या सफ़ाई के सामान मिल जाने के रूप में, कुछ परेशानियों से निजात पाने की उम्मीद करते थे। यद्यपि, जेल की नियमावली कहती है कि दिए गए बिस्तर में एक दरी, एक चादर, सर्दियों में सूत-ऊन के दो कंबल और खोली के साथ एक तकिया शामिल रहना चाहिए। लेकिन नए अहमद अगर मैला-कुचैला एक कंबल भी पा जाते हैं तो ख़ुद को भाग्यशाली मानते हैं।

जेल में, गहरी नींद सोने वालों को भी कभी कभी अपनी रात दूसरों के लिए समर्पित करनी पड़ती है। जब हर क़ैदी अपने निजी सपनों में खोए रहते हैं, बाजू में सो रहे लोगों के कमरे से सिसकियाँ, शोक और विलाप के स्वर लगातार आते हैं। जगे हुए लोग अक्सर रोने वाले को ख़ामोश करने के लिए चाटा जड़ देंगे। लेकिन सभी दुखी आत्माएँ इतनी आसानी से नहीं कुचली जा सकतीं। कुछ ऐसे लोग होते हैं जो ठहाकों से रात की सहम भरी चुप्पी को चीर देते हैं, ऐसे लोगों को ख़ामोश करने से पहले उन पर ज़्यादा शक्तिशाली हमले (उपचार) किए जाते हैं। चीख़ने-चिल्लाने वाला व्यक्ति, जिसे वास्तव में मनोवैज्ञानिक मदद की ज़रूरत होती है, मामूली सी सहानुभूति भी नहीं पाता। जब सारी बैरकों के लोग उठ जाते हैं तो कुछ बदमाश क़िस्म के लोग उसे पीटने और उसपर लात-घूसे बरसाने के लिए रात में तैनात सुरक्षाकर्मी के साथ हो लेते हैं। कई लोग मानते हैं कि उस आदमी को अपने आग़ोश में लेने वाले शैतान को उसके शरीर से भगाने का यही एकमात्र ज़रिया होता है। थोड़ी देर बाद, वह ख़ामोश हो जाता और पहले से ज़्यादा सन्नाटा उतर आता। जैसे [चुप कराया गया] क़ैदी अपने ख़ुद के शैतान से छिपने के लिए ख़ामोशी में दफ़न हो जाता है, नींद (वैसे ही) दुर्ग्राह्य हो जाती है। जब क्षण और मिनट कांटे की तरह गड़ रहे होते हैं, समय बताने के लिए कोई घड़ी नहीं है। ऐसे में, एक घंटा और ज़ब्त होता है, कभी नहीं लौटने के लिए।

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इस बंद दुनिया में, बाहर की ओर खुलने वाली मेरी एकमात्र खिड़की मेरे लिए किताबें और पत्रिकाओं मुहैया कराती थी। हालाँकि, महाराष्ट्र के जेलों के पास प्रकाशित सामग्रियाँ, यहाँ तक कि आधिकारिक सरकारी प्रकाशनों तक को, ख़रीदने के लिए कोई कोष नहीं होता है। जेल का पुस्तकालय पूरी तरह से व्यक्तियों और स्वयंसेवी संस्थाओं के चंदों पर निर्भर है। किताबों के चयन बिल्कुल उटपटांग हैं, जिनमें अधिकतर धार्मिक किताबें ही हैं। पहले तो, मैं डाक के ज़रिये जितनी पत्रिकाओं के ग्राहक बना, वे मेरी कोठरी तक कभी नहीं पहुँच पाईं। जेलर तय करता कि कौन सी किताबें हमारे लिए उचित हैं। एक बार हमें जेम्स बॉन्ड के उपन्यास देने से इंकार कर दिया गया क्योंकि उसका मुखपृष्ठ उन्हें अश्लील लग रहा था। वे हर-हमेशा हमारी पत्रिकाएँ हम तक पहुँचने से रोक देते क्योंकि उसमेंमाओवादीया क्रांतिशब्द होता था। यहाँ तक कि बहुत मोटा होने के कारण भारतीय संविधान भी हमें नहीं दिया गया।

जब कभी किताबें हमारे हाथ लगतीं, अपराध-उपन्यास हमेशा हिट रहे। अदालत के कमरों में होने वाले जिन ड्रामा या एक्शन की हम तलाश करते थे उनकी नामौजूदगी में, ली चाइल्ड और जॉन ग्रिशम के उपन्यास ही काम में आए। मैंने स्टीग लार्सन और हेनिंग मंकेल के स्कैंनडिवियाई उपन्यास भी पढ़े।

जेल प्रशासन द्वारा दोस्तों और परिवार से मुलाक़ात की दुर्भावनापूर्ण अनुमति एक अन्य छूट थी। सज़ायाफ़्ता क़ैदियों को एक महीने में एक बार और अंडरट्रायल्स को एक हफ़्ते में एक बार मुलाक़ात करने की अनुमति होती है। जो परिवार दूर दराज़ के गाँवों से लंबी यात्रा करने के लिए पर्याप्त पैसों का इंतज़ाम कर मिलने आते हैं उन्हें जेल दरवाज़े के पास मुलाक़ात बूथ पर सुबह-सुबह सबसे पहले अपना नाम दर्ज़ कराना होता है। इसके लिए परिवारवालों को तीन या चार घंटे तक, चाहे कड़ी धूप हो या बरसात, बाहर खड़े रहना होता है। यहाँ जेल प्रशासन उनकी छानबीन करता है कि वे मुलाक़ात के लिए सुरक्षा के लिहाज़ से योग्य हैं कि नहीं और कि कहीं उन्होंने अपना कोटा तो नहीं पार कर लिया है। थकान भरी इंतज़ार के बाद, मुलाक़ातियोंअधिकतर महिलाएँ और बच्चेको फिर बारी बारी से जालीनुमा खिड़कियों वाले एक कमरे में ले जाया जाता है। खिड़की की जालियों के उस पार हरेक के लिए क़ैदी इंतज़ार कर रहे होते हैं। वहीं पर दूसरी ओर, क़ैदियों को चेतावनी दी जाती है कि वे मुलाक़ात की निर्धारित समय-सीमा न लांघें। अंडरट्रायल्स को 20 मिनट और सज़ायाफ़्ता को 30 मिनट का वक़्त दिया जाता है। जाली के दोनों तरफ़ हमेशा ही एक ख़ास तरह की चिंता व्याप्त रहती है, क्योंकि क़ैदी और उनके परिवार के लोग इस कोशिश में रहते हैं कि सामने मिले छोटे से वक़्त में जो कुछ कहना है वह कहीं छूट न जाए।

मेरे पहले मुलाक़ाती मेरे माता-पिता और मेरा भाई था। हालांकि, मेरी पत्नी मुझसे मिलना चाहती थी, लेकिन पुलिस द्वारा गिरफ़्तार किए जाने के ख़तरे को देखते हुए हमने तय किया कि ऐसा करना ठीक नहीं होगा। पहली मुलाक़ात में, मेरे माता-पिता जालियों के पीछे मुझे एक छायाचित्र की तरह सिर्फ़ देख सके। उन्होंने मेरी सिर्फ़ आवाज़ से मुझे पहचान लिया। तार लगी जालियाँ किसी भी तरह के आश्वस्तकारी आलिंगन की राह में आड़े डटी रहीं। जब मेरी हिरासत खिंचती चली गई तो मेरे परिवार ने हर दो महीनों में मुझसे मिलने का प्रबंध किया। हमने तय किया कि अदालत में मेरी पेशी के वक़्त हमलोग मिलेंगे। यद्यपि, मेरे साथ रहने वाले सुरक्षाकर्मी कभी कभी इस सुविधा की अनुमति देने से इंकार कर देते थे। मेरे जेल के सालों में मेरे बच्चे ने मुझे कभी नहीं देखा। वह नहीं जानता था कि मैं क़ैद में हूँ। अगर वह आता तो उसे हथकड़ियाँ लगाए पिता का एक छायाचित्र ही देखना पड़ता। हमने सोचा कि दो साल के बच्चे के लिए यह समझना कुछ ज़्यादा हो जाएगा।

मेरा परिवार घर की ख़ुशियों से मुझे भरने की कोशिश करता, और मैं जेल जीवन की झांकियों से उन्हें वाक़िफ़ कराता। लेकिन, जैसे जैसे मुझ पर आरोपित मामलों की संख्या बढ़ती जा रही थी, वैसे ही हर मुक़दमे की प्रगति चकरा देने वाली थी, और मेरे बूढ़े माँ-बाप के साथ उनकी चर्चा करना मुश्किल होता जा रहा था। अंततः, मुलाक़ातें मेरी चीज़ों की एक सूची उन्हें देने और उनके द्वारा अगली मुलाक़ात में उन्हें लाने और हमेशा चिट्ठी लिखते रहने के वादे तक सीमित हो गईं।

+++

नागपुर जेल में मैंने महसूस किया कि अधिकतर क़ैदी एक अपराधीकी किसी परिचित परिभाषा में फ़िट नहीं बैठते। उन्हें जेल में इसलिए रखा गया है, क्योंकि या तो उन्हें पुलिस ने झूठे मामलों में फंसाया है या फिर अक्सर किसी पारिवारिक झगड़े के दौरान ग़ुस्से के वशीभूत होकर उन्होंने किसी पर कोई हमला बोल दिया है। कमज़र्फ़ क़ानूनी सलाह के कारण उन्हें अपने मुक़दमों में सज़ा होती है।

प्रारंभिक सदमे वाली सज़ा के बाद, लंबे सालों तक जेल में रहने के लिए उन्हें उदासीनतापूर्वक एक आज्ञाकारी दिनचर्या के अनुकूल ढलना होता है——आजीवन कारावास के मामले में महाराष्ट्र में औसतन 17-18 साल जेल में गुज़ारने होते हैं।

प्रार्थना और उपवास, पूजा, नमाज़ और रोज़ा के कठोर कार्यक्रमों से अधिकतर लोगों को दिलासा मिलती है। क़ैद आध्यात्मिकता को पालती-पोषती है। इसमें अलौकिक शक्तियों को मानते हुए उनके सामने अपना सब कुछ फेंक देने से कम से कम तात्कालिक तौर पर एक क़िस्म की प्रेरित करने वाली शांति प्रदान करने का गुण होता है। रिवाज़ों को धूम-धड़ाकों से मनाने से प्रशासनिक अनुमोदन भी पवित्र हो जाते हैं। यह जेल-प्रबंधन द्वारा अनुमोदित धार्मिक समारोहों में क़ैदियों को प्रदर्शित होने, या संगठित होने देने तक का लाभ देता है।

भ्रम और हक़ीकत के बीच, उम्मीद और नाउम्मीदी के बीच, लुका-छिपी का ये खेल किसी क़ैदी के अस्तित्व का लगभग आधार होता है। ये चाल चलने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि चुभते भ्रमों में तथ्यों की इजाज़त नहीं है, और नाउम्मीदी को उम्मीद के ऊपर जीत हासिल करने की इजाज़त नहीं है। एक बार क़ैदी यह मान जाएँ तो उनके संतुलन को बनाए रखना उतना मुश्किल नहीं होता है।

एक अंडरट्रायल के बतौर, आपको ख़ुद से कहना होता है कि मुक़दमा ठीक-ठाक चल रहा है, सारे गवाह [आपके ख़िलाफ़] नाकाम हो गए हैं, और आपको छूटना ही छूटना है। अगर आपको सज़ा हो जाती है, तो ऊँची अदालतो पर आपको अपनी उम्मीद टिकाए रखनी होती है। और इस मामले में, भारतीय न्यायिक व्यवस्था की अंतहीन देरियाँ वास्तविक वरदान होती हैं। उच्चतम न्यायालय पहुँचने तक उम्मीद बची रहती है। इस वक़्त तक आप महसूस करने लगते हैं कि आपकी सज़ा अंत की ओर पहुँच रही है, और इसे अब ख़त्म हो जाना चाहिए। फिर आप छूटों और माफ़ी के लिए आगे ताकते रहते हैं।

आप अपनी लिखान पर आख़िरी निर्णय के इस पेचीदा, फिर भी उम्मीद-भरे दौर के इंतज़ार में प्रवेश करते हैं। लिखान हर लंबी सज़ा पाए मुज़रिम की जेल न्यायिक विभाग द्वारा तैयार की गई समीक्षा-फ़ाइल के लिए प्रचलित एक शब्द है। यह दस्तावेज़ राज्य सरकार को क़ैदी की सज़ा की समीक्षा और समय-पूर्व रिहा करने के आदेश हासिल करने के लिए भेजा जाता है। इसमें जेल में क़ैदी के व्यवहार की रिपोर्ट और उन छूटों का हिसाब होता है जिनके लिए वह योग्य है। इसमें जेल, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की अनुशंसाएँ भी होती हैं। चूंकि, सरकार के समय-पूर्व रिहाई के नियम काफ़ी जटिल हैं, इसलिए कोई क़ैदी विरले ही आकलन कर पाता है कि अंततः उसके लिखान में क्या होगा।

मंत्रालय को निर्णय लेने में सालों लग जाते हैं। तब तक आप कुछ अंदाज़ा लगाते हैं कि आप अंततः कब अपनी रिहाई की अपेक्षा कर रहे हैं। और तब आप उल्टी गिनती शुरू करते हैं, घर जाने के बचे हुए दिनों में निशान लगाने लगते हैं।

+++

इन सबके बाद, जबकि आप अपना संतुलन बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं, उम्मीद और निराशा का अटल प्रतीक है, लाल गेट, अर्थात लाल निकास दरवाज़ा। यह गप्पबाज़ियों में, मामूली बातचीत में, मज़ाक़ में और, यक़ीनन, सपनों में भी बार-बार प्रकट होता है। यह एक अवरोध है जो आपको अंदर बांधे रखता है और आपको बाहर की ओर ले जाने के रास्ते खोलता है। इसका राज़ ये होता है कि आपको अवरोधों को नज़रअंदाज़ करना होता है और सिर्फ़ दरवाज़ा देखना होता है। इससे सामान्य ज़िंदगी के कुछ आभास को बनाए रखने में मदद मिलती है।

लेकिन कुछ लोगों के लिए, जेल-जीवन के वो लंबे साल बाहरी दुनिया से थोड़े-से संपर्क या संचार के बग़ैर ही होते हैं। ग़रीबी उन्हें उतने पैसों के इंतज़ाम करने में भी बाधा बनती है जितना कि एक क़ैदी को छुट्टी या पैरोल पर भेजने के लिए राज्य को ज़मानतदारी में चाहिए होता है।

इसके अलावे, कई परिवार ऐसे होते हैं जो महीने की मुलाक़ात के लिए जेल आने का ख़र्च नहीं उठा सकते। निरक्षरता या पारिवारिक संबंधों के विघटन का मतलब होता है कि चिट्ठी-पत्री तक नहीं भेजी जा सकती। जैसे जैसे तन्हाई के ये साल बढ़ते जाते हैं, वैसे वैसे इन क़ैदियों को निष्ठुरता (और पागलपन) से अलग करने वाली रेखा तेज़ी से धुंधलाने लगती है।

तिरसठ-साल-के-बूढ़े किथूलाल एक ऐसे ही व्यक्ति थे। सामान्य ज़िंदगी की कुछ झलकियों के लिए वे समय को ठेंगा दिखाते रहे। वे ख़ुद को समझाते रहते थे कि उन्होंने अपना समय पूरा कर लिया है और कि भली सरकार जल्द ही एक विशेष छूट की घोषणा करने जा रही है जिससे उनकी रिहाई हो जाएगी। गणतंत्र और स्वतंत्रता दिवस के तीन-चार महीने बारीक़ी से उम्मीद की फ़सल बोए जाने का दौर होते थे; जो भी इन पर ग़ौर करने की परवाह करता, उससे कहा जाता था कि सरकार एक असाधारण स्थगनादेश की घोषणा करेगी और उसे इस महान दिवस को लाल गेट से बाहर जाने दिया जाएगा।

जैसे ही दिन आते और चले जाते, वैसे ही इस बारे में सबसे ज़्यादा उत्साही क़ैदियों पर एक असामान्य ख़ामोशी तारी हो जाती थी।

फिर उन्हें अन्य तरीक़े ईजाद करने होते थे। वे स्पष्टतः अतार्किक गतिविधियों के झोंके में बह जाते थे, मानो कि पर्याप्त मात्रा में बिखरी हुई मिठाई दर्द को दूर भगाने वाली हो। उपवास और अन्य रिवाज़ों के सामान्य मुग़ालते बड़े आयामों को समेटे हुए होते हैं।

थोड़े समय बाद, वे अपनी रिहाई की अगली तारीख़ पर अपनी उम्मीद सहेजना शुरू कर देते थे।

+++

क़ानून का ख़याल रखते हुए, मैंने अगस्त 2007 में ज़मानत की अर्ज़ी दी। हालांकि, मुझे यह महसूस हो गया था कि भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में तेज़ी से मुक़दमों का निपटारा एक विलासिता थे। एक मुक़दमे को पूरा होने में औसतन तीन से पाँच साल लगते हैं। तक़रीबन डेढ़ साल तक हथियारबंद पुलिसकर्मियों के साथ पुलिस वाहन में बैठकर मैं लगभग रोज़ाना नागपुर से गोंदिया या चंद्रपुर तक सात घंटे की यात्रा करता रहा।

अदालत पहुँचने पर मुझे पता लगता कि मुझे देरी से लाया गया है या फिर न्यायाधीश महोदय छुट्टी पर होते थे। मेरे वक़ीलों और मेरी यात्राएँ अक्सर बेकार हो जाती थीं, क्योंकि अभियोजन पक्ष के गवाह ही हाज़िर नहीं होते थे।

एक ख़ास मामला तीन सालों तक खिंचता रहा और अंततः सिर्फ़ एक गवाह के बयान के बाद मुझे बरी किए जाने के साथ ख़त्म हो गया। मुझे क़ैद करने वाले क़ानून की मुनासिब प्रक्रियाओं का इस्तेमाल लोग मुझे दंडित करने के लिए कर रहे थे। मेरी एकमात्र उम्मीद हरेक मामले को बड़े धीरज से पूरा करने और अंततः रिहा होने में लगी हुई थी।

+++

जेल में अपने पहले साल के दौरान, अंडा बैरक के अकेलेपन में, मेरे सह-आरोपी और मुझे दूसरे अन्य क़ैदियों से दूर रखा जाता था क्योंकि जेल प्रशासन हमें बहुत ख़तरनाक मानता था इसलिए उनके साथ [मिलने-जुलने की अनुमति] नहीं देता था।

यह इशारा करने के लिए कि हम औरों से जुदा थे, सभी कथित नक्सली क़ैदियों को जेल के लिबास के साथ बाँह में हरी पट्टी बाँधने को मज़बूर किया जाता था। अप्रैल 2008 में, हममें से सभी 13 लोग एक अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए। हमारी माँगें थीं: हमें अलग-थलग, अकेले में नहीं रखा जाए, सामाजिक कार्यकर्ताओं को नक्सलवादी कहकर उनकी गिरफ़्तारी बंद की जाए, और अंडरट्रायल्स को यूनीफ़ॉर्म पहनने के लिए मज़बूर न किया जाए।

हमें तोड़ने के लिए, अलग अलग बैरकों में हमें फेंक दिया गया। मुझे फांसी यार्ड में स्थानांतरित कर दिया गया। (फांसी यार्ड मौत की कतार में खड़े क़ैदियों का होता है।)

हमारी हड़ताल 27 दिनों तक चली। हमारी कोई एक माँग पूरी नहीं की गई। बदले में, इस मामले की जाँच कर रहे पुलिस अफ़सर ने जेल अधिकारियों को सलाह दी कि हमें विभिन्न जेलों में अलग अलग भेज देना चाहिए। हमारे ख़िलाफ़ एक और आपराधिक मामला दर्ज़ कर लिया गयाआत्महत्या की कोशिश का मामला। यह नौवाँ मामला था जिससे मुझे निपटना था।

+++

सितंबर 2011 में, अदालतों ने अंततः मेरे ख़िलाफ़ लगाए गए अंतिम नौ मामलों को ख़ारिज़ कर दिया। जेल का सहज ज्ञान कहता है कि जेल के कुछ शुरुआती और कुछ आख़िरी महीने सर्वाधिक ख़ौफ़नाक़ होते हैं। जैसे-जैसे आज़ादी क़रीब आती जाती थी, वैसे ही दिन लंबे और रातें बग़ैर नींद की होती जा रहीं थीं। अदालत में पेश करने की तारीख़ें भी कम होती जा रही थीं। सारा पढ़ना और लिखना बेहद बोझिल होता जा रहा था। मैंने लाल गेट से आगे की ज़िंदगी की योजनाएँ बनानी शुरू कर दी थीं।

27 सितंबर को मैंने जेल छोड़ा। मैं अपने माता-पिता को बाहर खड़े देख सकता था। पत्रकारों और मेरे वक़ीलों के साथ वे मुझे देख ही रहे थे कि सादे कपड़ों में पुलिस के एक दल ने मुझे बिना किसी नंबर वाले वाहन में धकेला और कहीं दूर ले गए। पुलिस ने मेरे ऊपर दो और नक्सल संबंधी मामले थोप दिए, और मुझे वापस जेल भेज दिया।

यातना, ज़मानत अर्ज़ी और मुक़दमे की तारीख़ों के अंतहीन इंतज़ार के फिर उसी [पीड़ित] दौर से गुज़रने के बारे में सोचकर मैं ढह गया। लेकिन इस बार, शुक्र था, कि यह जल्दी निपट गया। जेल के बाहर, देश-दुनिया से लोगों की एक सशक्त आवाज़ और मेरे वक़ीलों के हुनर ने मेरा साथ दिया।

4 जनवरी 2012 को आख़िरी बचे मामले में मैं ज़मानत पर रिहा हुआ। चार साल, आठ महीनों के बाद, मैं एक आज़ाद व्यक्ति बन लाल गेट के बाहर आ गया।

अंग्रेज़ी से अनुवादअनिल मिश्र

2 Comments leave one →
  1. Syed Mohd Bilal permalink
    July 3, 2012 12:34 PM

    Sometimes i feel ashamed calling myself the citizen of this country.

  2. suresh permalink
    July 3, 2012 4:17 PM

    Just to mention that the English language version from which the above has been translated is on the Open Magazine website.

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