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दिल्ली बनाम बम्बई

October 28, 2012

भारत के दो महानगरों राष्ट्रिय राजधानी दिल्ली और बम्बई को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर की सूची में नामांकित करने की तैयारियां चल रही हैं, कुछ मित्रों ने दिल्ली या बम्बई की बहस शुरू कर दी है जो वास्तव में पूर्णत: अनर्गल बात है.

में दिल्ली बनाम बम्बई के पचड़े में पड़ने के बजाये ये सवाल पूछना चाहता हूँ के ऐसा क्यों है के 65,436,552 की कुल आबादी और 6,74,800 वर्ग किलोमीटर के कुल क्षेत्रफल वाले फ्रांस में 35 स्थान, नगर, इमारतें प्राकृतिक स्थल आदि ऐसे हैं जो विश्व धरोहर की सूची में शामिल किये गए हैं मगर इस सूची में भारत का नाम केवल 29 बार ही आता है.

जो सवाल पूछना ज़रूरी है वो यह के सिर्फ दिल्ली या/और बम्बई ही क्यों? जोधपुर, जयपुर, अजमेर, इंदौर, उज्जैन, भोपाल, बनारस, इलाहबाद, लखनऊ, पटना, वैशाली, हैदराबाद, विदिशा कालिंजर, मदुरै, कांचीपुरम कलकत्ता और मद्रास क्यों नहीं ?, आप ने नोट किया होगा के बम्बई कलकत्ता और मद्रास के नए नाम में इस्तेमाल नहीं कर रहा हूँ और दिल्ली को भी देहली नहीं लिखा है. यह जान बूझ कर किया जा रहा है दरअसल विरासत कहीं अतीत में जड़ हो गयी कोई चीज़ नहीं है और इसलिए नाम बदलने की समस्त परियोजनाएं विरासत से छेड़ छाड करने की निन्दनीय प्रवर्ति का ही हिस्सा हैं.

नाम बदलने की इस प्रवर्ति ने सेकडों साल के इतिहास का नाम--निशाँ तक मिटा दिया है लगता है हम कभी अंग्रेजों के गुलाम थे ही नहीं अब वो कितने ही बुरे दिन क्यों न रहे हों आज वो उस इतिहास का हिस्सा है जो हमारा है. अगर हर चीज़ का नाम जवाहर लाल नेहरु, राजीव गान्धी, सरदार पटेल, छत्रपति शिवाजी, दीन दयाल उपाध्य, हेडगेवार, कर्पूरी ठाकुर, कांशीराम वगेरा के नाम पर ही रखा जायेगा तो जब “आज” इतिहास बन जाएगा तो आने वाली पीढियां कल किस चीज़ को अपनी विरासत मानेंगी. इन राजनेताओं को, कोई कवि नहीं, कोई लेखक नहीं कोई संगीतकार नहीं, बस केवल यह कोरे राजनेता जिन में से कई तो पूरे राज नेता भी नहीं भ सके.

आज हम दिल्ली और बम्बई की लड़ाई में इसलिए फंसे हैं के हमें कोई अंदाज़ा ही नहीं है के हमारी सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत दरअसल है कितनी विशाल और हमारी विरासत के साथ इस से बुरा और कुछ नहीं हो सकता के हम उसे इन तंग राजनीतिक दीवारों में सीमित कर के रखें. सुना है वो पेड जिस के नीचे चंद्र शेखर आज़ाद ने आखरी साँसे लीं थी काट दिया गया है, अहमदाबाद में 17 वीं सदी के महान शायर “वली दक्कनी” के मजार की जगह रातों रात सड़क बना दी गयी गोधरा की प्रतिक्रिया का ठीकरा एक शायर के सर ही फूटना था “वली दक्कनी” “वली गुजराती” के नाम से भी जाने जाते थे.

हम मिथकों और तथ्यों में फर्क करना नहीं जानते और अगर कोई यह सवाल उठाए तो हमारी भावनाएं आहत हो जाती हैं और हम मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं.

हमारी समस्या यह है के हम जहाँ एक तरफ़ सड़कों के नाम बदल रहे हैं वहां दूसरी तरफ़ पूरी कोशिश यह है के नई दिल्ली को और बम्बई को विश्व धरोहर में ज़रूर शामिल किया जाये, बम्बई तो खैर किसी हद तक समझ भी आता है क्योंके फोर्ट एरिया, काला घोडा आदि के इलाके से चर्च गेट तक कई ऐसी इमारतें हैं जो 187 वर्ष से लेकर 125 वर्ष तक पुरानी हैं और धरोहर कहे जाने की शर्तों को पूरा करती हैं जैसे हौर्निमन सर्कल 1825 में निर्मित, क्रॉफोर्ड मार्किट 1869 में निर्मित, विक्टोरिया टर्मिनल (अब छत्रपति शिवाजी टर्मिनस) 1887 में निर्मित, बम्बई यनिवर्सिटी 1887 में निर्मित आदि, 1850 में बम्बई की पहली टेक्सटाइल मिल बॉम्बे स्पिनिंग मिल खुली थी, सो बम्बई में आधुनिक उद्योग का इतिहास भी 160 वर्ष पुराना तो है ही.

अब नई दिल्ली को लीजिए नई दिल्ली में बनी हुई इमारतें 1911 में राजधानी को कलकत्ते से दिल्ली लाने के ऐलान के बाद ही बनना शुरू हुई थी और इनमें से में किसी को भी बने हुए 100 बरस नहीं हुए हैं विरासत का हिस्सा होने के लिए यह न्यूनतम शर्त है. नई दिल्ली की ज़्यादा तर इमारतें 1920 के दशक के अंत में बनी हैं. राष्ट्रपति भवन 1929 में बन कर तैयार हुआ, कनाट प्लेस 1933 में तैयार हुआ और संसद भवन 1927 में.

नई दिल्ली में केवल सरकारी अफसर और उनके नौकर रहते थे. निचले दर्जे के सरकारी कर्मचारी दिल्ली के गाँवों में या पुरानी दिल्ली में रहते थे. यहाँ कोई कारीगर, मजदूर, शिल्पकार कभी नहीं रहा. नई दिल्ली ने आज तक सरकारी और, विपक्ष के बयानों के अलावा किसी चीज़ का उत्पादन नहीं किया. उद्योगों, मजदूरों, कारीगरों, मंडियों, और विशिष्ठ खानों के बगैर और रात गए तक की चहलपहल के बिना कोई जगह शहर नहीं बन सकती. नई दिल्ली शहर नहीं है.

नई दिल्ली को विश्व विरासत मे शामिल करने की ज़ोरदार वकालत के पीछे वो लोग हैं जो नई दिल्ली के आलिशान बंगलों में रहते हैं और आज भी “राज” के सपने देखते हैं, वे अपने इन विशिष्ट अधकारों की रक्षा के लिए विरासत के कवच का इस्तेमाल कर रहे है. इस सारी बहस में 350 बरस से पहले बसने वाली पुरानी दिल्ली, जिसे डीडीए के झुग्गी झोपडी विभाग के हवाले कर दिया गया है और जिसे वाल्ड सिटी का नाम दे कर नजरों से ओझल कर दिया गया है, वो पुरानी दिल्ली जो असल में विश्व धरोहर का हिस्सा होनी चाहिए उसका ज़िक्र यदा कदा किसी कड़वी याद की तरह ही होता है.

हम अपने 25 या 30 से अधिक पुराने शहरों की सूची क्यों नहीं बनाते? उन शहरों के इतिहास को लिखने के लिए आधुनिक दृष्टि रखने वाले अच्छे पुरातत्त्ववेत्ताओं और इतिहासकारों की मदद क्यों नहीं लेते और फिर इन सब नगरों की सूची ले कर यूनेस्को से क्यों नहीं कहते के दुनिया के सब से पुराने शहर यहाँ, एशिया और अफ्रीका में, बसे थे. विश्व धरोहर की सूची में योरोप के नगरों का प्रभुत्व रहना इंसानी धरोहर के केवल एक छोटे से हिस्से का प्रतिनिधित्व करने के समान होगा.

नई दिल्ली को यूनेस्को विश्व धरोहर की सूची में शामिल करने की भाग दौड़ बंद कर के शाहजहानाबाद, दूसरी पुरानी दिल्लियों और उन शहरों को जिन का ज़िक्र ऊपर आया है विश्व संपदा की सूची में शामिल करने के अभियान में क्यों नहीं लग जाते, जिन्हें अंग्रेजों की धरोहर बुहत प्यारी है उन्हें पुरानी दिल्ली में अंग्रेजों के काल की बनी हुई ऐसी बुहत सी इमारतें मिलेंगी जो विश्व धरोहर का हिस्सा बनने के काबिल हैं. हमें इस बात पर भी जोर देना होगा के योरोपिय माप डंडों की बिना पर पर तीसरी दुनिया के शहरों का आंकलन करने से केवल पहली दुनिया की धरोहर की ही बात होगी.

2 Comments leave one →
  1. October 29, 2012 9:05 AM

    पूरी तरह से सहमत हूँ. हमें बेकार की बहसों में पड़ने की जगह देश के सभी विरासतो की सूची बना कर उसे विश्व धरोहर बनाने के लिए प्रयास करना चाहिए. हर राज्य से इस प्रकार के प्रयास की आवश्यकता है.

  2. November 3, 2012 3:08 PM

    A good article. i believe we, as a country, are right now so entangled in our existential crisis (owing to poor governance, ill economy and exploited environment) that we have abandoned thinking of our heritage, history and national pride. the current generation has forgotten the contributions of the Premchands and the Ghalibs. Instead of seeking UNESCO’s validation of our cultural heritage, we should invest time in reconnecting with our own art and crafts. I am positive anyone touched by the beauty of Indian heritage (art, music, history, books) cannot help but respect it.

    Jai Hind,
    Sanjay
    (a 20-yr old member of the new India)

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