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लोकतंत्र के ईश से दूर होते नीतीश : मनीष शांडिल्य

November 4, 2012

नीतीश कुमार और मीडिया दोनों एक-दूसरे को बहुत प्रिय हैं. (यहां मीडिया से तात्पर्य मुख्यतः बिहार के मुख्यधारा के बड़े अखबारों से है.) नीतीश कुमार बतौर मुख्यमंत्री मुख्यधारा की मडिया पर बिहार का खजाना लुटाते हैं और बदले में मीडिया अपना युगधर्म भूलकर उनकी झूठी-सच्ची तारीफ में लगा रहता है, उनके पक्ष में तर्क-कुतर्क गढ़ता है, अखबार संदर्भ-बेसंदर्भ उनकी बड़ी-बड़ी तसवीरें छापते हैं. वैसे नीतीश कुमार और मीडिया के बीच के मधुर रिश्ते की और भी दूसरी बड़ी वजहें भी हैं, लेकिन उनकी चर्चा फिर कभी. फिलहाल इस रिश्ते का जिक्र इस कारण क्योंकि पिछले दिनों नीतीश अखबारों के पहले पन्नों पर दिखाई तो दे रहे थे, मगर कुछ दूसरे अंदाज में उनकी तस्वीरें छप रही थीं.

मामला कुछ यूं था. बिहार को विशेष राज्य दिलवाने की मांग (या कहें जिद) के लिए जन-समर्थन जुटाने जब इस बार नीतीश कुमार बिहार भर की ’अधिकार-यात्रा’ पर निकले तो जनता-जर्नादन को अपने अधिकारों की भी याद आ गई. (लिखत-पढ़त में यह उनकी सरकारी यात्रा नहीं थी!) मिथिलांचल इलाके से इस यात्रा के दौरान आम लोगों, खासकर नियोजित शिक्षकों ने अपने मांगों के समर्थन में नीतीश कुमार का ध्यान खींचना शुरू किया. गौरतलब है कि इस मंहगाई में नौकरी करते हुए भी मात्र छह-सात हजार मासिक पाने वाले ‘सरकारी’ शिक्षकांे को बिहार में कई महीनों से वेतन तक नहीं मिल रहा था. अब जनता का तो अपना तरीका होता है (कहीं-कहीं बहकावे में भी आ जाती है, कहीं-कहीं जनता की भीड़ में शरारती तत्व भी घुस जाते हैं), वह कहीं काला झंडा लहराने लगी तो कहीं मंच की ओर चप्पल दिखाने-उछालने लगी. उपेक्षा और परेशानियों से उपजे लोगों के आक्रोश ने खगड़िया जिले में रौद्र रूप धारण कर लिया. और खगड़िया के बाद ही नीतीश कुमार अखबारों में उस अंदाज में दिखाई देने लगे, जिस बदले रूप का ऊपर जिक्र है.

इस विरोध से तमतमाए और प्रकारांतर से ‘देख लेने की धमकी’ तक देने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जनता से दूरियां बनानी शुरू कर दीं . जबकि होना यह चाहिए था कि वे जनता से सीधा संवाद स्थापित करते. कम-से-कम जनता को दिक्कतें दूर करने का दिलासा देते. लेकिन हुआ इसका उल्टा. खगड़िया के बाद उनके सभा के आस-पास हर तरह के विरोध प्रदर्शन को रोका जाने लगा, नहीं मानने पर पुलिस ने बल-प्रयोग किया. संबंधित जिलों में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के दौरान कुछ समय के लिए अघोषित आपातकाल लगा दिया जाने लगा. मुख्यमंत्री को अप्रिय लगने वाली घटनाओं की खबरें-तस्वीरें त्वरित ढंग से बाहर न जा सकें, इसको घ्यान में रखकर कार्यक्रम के कुछ समय पहले से इंटरनेट सेवा संबंधित इलाकों में ठप्प कर दी जाने लगी. कोई विरोध में काला कपड़ा न लहरा दे, इससे बचने के लिए नीतीश सरकार की पुलिस लड़कियों का काला दुपट्टा तक उतरवाने लगी. (हालांकि यह गलती स्वीकार करते हुए नीतीश कुमार ने बाद में पटना में इस पर खेद जताया और जरूरी कार्रवाई का आश्वासन दिया.)

यह सब होता रहा मगर अखबारों से इस तानाशाही की, अघोषित आपातकाल की खबरें सिरे से गायब रहीं. कभी-कभार कुछ छिटपुट खबरें छप जातीं. और दूसरी बात यह हुई कि इस दौरान नीतीश कुमार पहले पन्ने पर सिर्फ मंच पर से जनता को संबोधित करते हुए ही दिखने लगे. ऐसा इस कारण था कि खगड़िया के बाद किसी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए नीतीश कुमार के कार्यक्रमों में मंच से जनता को बहुत दूर रखा जाने लगा, श्रोताओं को इतनी दूर रखा जाने लगा कि चप्पल-अंडे न पहुंचें. (जैसा कि इस लेख के साथ लगी तस्वीर में साफ दिखाई देता है). अगर जनता को संबोधत करते हुए नीतीश कुमार की तस्वीर छपती तो उनके कार्यक्रमों का ‘लोकतांत्रिक’ चेहरा सामने आ जाता.

अधिकार यात्रा के दौरान जनता से नीतीश की बढ़ती दूरी यहीं पर आकर नहीं रुकी. यह अपने चरम पर तब दिखाई दिया, जब नीतीश कुमार ने अपनी आरा और बक्सर जिलों की यात्रा रद्द कर दी. गौरतलब है कि ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के बाद यह दूसरा अवसर है, जब नीतीश कुमार ने इस इलाके की अपनी यात्रा रद्द की. लेकिन ऐसा कर एक बार फिर नीतीश कुमार ने जनता के साथ संवाद स्थापित करने का मौका खो दिया. यह सही है कि मुखिया की हत्या के बाद बिहार में मुखिया की जाति का एक बड़ा प्रतिगामी तबका नीतीश कुमार से नाराज है. यह नाराजगी मुखिया के गृह जिले आरा में कुछ ज्यादा ही है. साथ ही मुखिया की हत्या के बाद आरा में दलित छात्रों पर जिस तरह से जुल्म ढाया गया है, उन्हें पुलिस और मुखिया समर्थकों ने जिस तरह नाहक परेशान किया है, उससे ये छात्र भी काफी आक्रोश में है. लेकिन नीतीश कुमार इनसे संवाद कायम करने के बजाए, आलोचना, आक्रोश और तीखी प्रतिक्रियाओं से मुंह फेर लेने की रणनीति पर चल रहे हैं. शुतुरमुर्गी रवैया अपना रहे हैं.
आधिकारिक रूप से नीतीश कुमार की आरा और बक्सर जिलों की यात्रा रद्द करने की जाने की वजह यह बताई गयी कि बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार के अशांत जिले मधुबनी की स्थिति पर नजर और नियंत्रण रखने के लिए यह यात्रा स्थगित कर रहे हैं. गौरतलब है कि पिछले दिनों एक छात्र के हत्या की अफवाहों के बीच मधुबनी में स्थिति हिंसक हो गई थी. और पुलिस की गोली से तीन युवक मारे गए थे.

लेकिन अगर मधुबनी जैसी दूसरी घटनाओं के आइने में नीतीश कुमार को देखें तो उनका एक दूसरा ही अलोकतांत्रिक चेहरा सामने आता है. बतौर मुख्यमंत्री वे ऐसे किसी भी जगह जाने से परहेज करते रहे हैं जहां लोग अलग-अलग वजहों से मारे गए हों. चाहे आम जनता मधुबनी, फारबिसगंज और कहलगांव (भागलपुर) में पुलिस की गोली का शिकार हुई हो, या और जमुई में नक्सली हिसा की भेंट चढ़ी हो या फिर खगड़िया में ही भारी संख्या में नाव दुर्घटना में मारी गई हो. हद तो तब हो जाती है जब कुछ मौकों पर नीतीश कुमार पुलिस अधिकारियांे को ही मरहम लगाने के लिए आगे कर देते हैं जबकि लोगों की मौत भी पुलिस की गोली से ही होती है. जैसे कि उन्होंने कहलगांव गोली कांड के बाद लोगों को शांत कराने का जिम्मा वरीय पुलिस अधिकारी अभयानंद (बिहार के वर्तमान पुलिस महानिरीक्षक) को सौंपा था. ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के बाद भी नीतीश कुमार ने अभयानंद को ही ‘क्रोध शमन’ पर लगाया था. जबकि एक ऐसा मुख्यमंत्री जो बात-बेबात पर जनता से संवाद करने यात्राओं पर निकल पड़ता है, से यह अपेक्षित भी है कि वह बड़ी घटनाओं के बाद भी जनता के बीच जाए. लेकिन नीतीश कुमार घटना स्थल पर जाना तो दूर राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में प्रतिक्रिया व्यक्त करने तक में अच्छा-खासा समय लगाते हैं. जैसा कि उन्होंने फारबिसगंज पुलिस फायरिंग के बाद किया था. इतना ही नहीं बिहार के गैर-राजनीतिक आंदोलनकारी व सामाजिक कार्यकर्ता एक सुर में यह आरोप लगाते हैं कि मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार अूममन प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधिमंडल से मिलना तो दूर, अपने हाथों से उनका मांग-पत्र स्वीकार करना तक मुनासिब नहीं समझते हैं.
नीतीश कुमार के ऐसे व्यवहार को देखकर बरबस बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की याद आ जाती है. जनता से सीधा संवाद स्थापित करने में जिनका कोई सानी आज भी नहीं है. बिहार से प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी अखबार के एक वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि सेनारी नरसंहार के बाद सवर्ण तबके के जिस जाति विशेष के लोग मारे गए थे, वे स्वाभाविक रूप से बहुत आक्रोश में थे. निशाने पर उग्र वामपंथी संगठन के साथ-साथ लालू यादव भी थे. घटनास्थल पर न जाने की प्रशासन और सहयोगियों की सलाह को दरकिनार करते हुए वे उस गांव में पहुंचे जहां नरसंहार हुआ था. अनुमान के मुताबिक ही उनका जबरदस्त विरोध हुआ. तब उन्होंने नारेबाजी के बीच ही एक आक्रोशित की ओर अपना गाल आगे बढ़ा दिया अैर कहा कि जो गुस्सा उतराना है उतार लें, लेकिन उन्हें घटनास्थल पर जाने दें. इस तरह उन्होंने भीड़ को शांत कर, एक हद तक उसका विश्वास जीतकर घटनास्थल का दौरा किया. मगर लंबे समय तक लालू प्रसाद यादव के ‘चाणक्य’ रहे नीतीश कुमार लालू से यह गुण सीख नहीं पाए.

लेकिन यह भी सच है कि आज नीतीश कुमार जनता के साथ जैसा व्यवहार कर रहे हैं, यह किसी एक शासक के मन-मिजाज का मामला भर नहीं है. मूल में यह सत्ता का चरित्र है. वो शासक ही क्या जो जनता से दूर न हुआ! लेकिन जो दूरी कुछ दिनों पहले नीतीश कुमार ने जनता और अपने मंच बीच पैदा की है, कहीं ऐसा न हो कि वह धीरे-धीरे उन्हें सत्ता की कुर्सी से ही दूर न कर दे. बेहतर होगा नीतीश कुमार ‘जनता के दरबार में मुख्यमंत्री’ और यात्राओं में अपनी उर्जा जाया करने से बचते हुए सही मायनों में लोकतंात्रिक बनें या फिर बकौल ब्रेख्त वे यदि बिहार की जनता से नाखुश हैं तो उनको खुली छूट है कि इस जनता को भंग कर वह अपने लिए दूसरी जनता चुन लें.

4 Comments leave one →
  1. November 4, 2012 7:39 AM

    नीतिश कुमार और मीडिया के चरित्र को तर्कपूर्ण और तथ्यों के साथ ओपन पत्रिका ने एक स्टोरी की थी और उसका शीर्षक ही रखा- एडिटर इन चीफ ऑफ बिहार. स्टोरी में स्पष्ट बताया गया है कि जो अखबार( उर्दू अखबार के साथ हुई घटना का जिक्र भी है) नीतिश कुमार की सरकार से असहमति जताते हैं उनके साथ क्या किया जाता है, वही दूसरी तरफ कैसे लगभग पूरा मीडिया उनके आगे लोटता है..http://www.openthemagazine.com/article/nation/editor-in-chief-of-bihar

  2. November 4, 2012 8:48 AM

    I appreciate the points that you’ve highlighted here. I have always been pro-Nitish because of the developmental spree that I saw in Patna since he took over the governance. But it now appears that Bihar is stooping back to the same condition that it had under the RJD regime. It would be very bad to see Nitish turning into the same character as that of Lalu and Rabri ,and Bihar being left with no options.

  3. harsht permalink
    November 4, 2012 8:57 AM

    अगर नितीश कुमार सरकार पिछली सर्कार की तुलना में निश्चित रूप से बेहतर न होती , तो वर्तमान के राजनैतिक माहोल में उनका सत्ता में इतने भारी बहुमत के साथ लौटना संभव नहीं था। अब लालू की वापसी न हो, यही मेरी प्रार्थना है

  4. ajay anand permalink
    December 1, 2012 12:02 AM

    मीडिया को किस तरह बर्बाद किया जाये यह बिहार के मुख्यमंत्री से सीखना चाहिए । बिहार प्रमुख अखबार तो सरकार की मुख पत्र बन कर रह गयी है । लोगो मे मीडिया की साख दिन प्रातिदिन खोती जा रही है … nda-1 की सरकार मे भले खुछ अच्छे काम हुये हों ,लेकिन एनडीए-2 में वैसा कुछ नहीं दिखाता …..

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