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विश्वविद्यालय के विचार का अंत : अपूर्वानंद

November 24, 2012

दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन और अध्यापक वर्ग के लिए यह समान रूप से चिंता का विषय होना चाहिए कि मानव संसाधन और विकास मंत्री को प्रशासन को यह सलाह देने की ज़रूरत पड़ी कि परिसर में किसी भी प्रकार का अकादमिक परिवर्तन पर्याप्त और वास्तविक  विचार-विमर्श और संवाद के जरिए ही लाया जाना चाहिए और यह कि दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ अध्यापाकों द्वारा  चुनी हुई वैधानिक  संस्था है . इसका अर्थ यह है कि विश्वविद्यालय परिसर में संवाद टूट गया है.  शिक्षक संघ से कई मामलों में  जगह असहमत अध्यापकों  का भी  ऐसा महसूस करना  क्या उनकी अतिरंजित प्रतिक्रिया है ?

संवाद की आरंभिक शर्त यह है कि शामिल पक्ष एक-दूसरे के स्वतंत्र मत के अधिकार को स्वीकार करें और उसका सम्मान करें. लेकिन यदि विश्वविद्यालय प्रशासन के किसी प्रस्ताव पर विचार के लिए विभागीय बैठक के पहले अध्यक्ष को यह निर्देश प्राप्त हो कि वह प्रस्ताव के पक्ष , विपक्ष में मत देने वाले अध्यापकों के ही नहीं , उनके नाम भी भेजें जो मत नहीं देना चाहते तो सन्देश स्पष्ट है. प्रशासन के प्रस्ताव से अलग मत रखने  वाले संदिग्धों की सूची में डाल दिए जाएंगे. इसका तात्पर्य  यही हो सकता है कि विश्वविद्यालय अपने अध्यापक की व्यक्तिमत्ता को स्वीकार करने को तैयार नहीं. लेकिन  विश्वविद्यालय की तो खूबी यही है कि वह मुझे अकेले एक व्यक्ति के रूप में खड़े रहने का साहस देता है. इसका अर्थ यह है कि मैं अपनी इस व्यक्तिमत्ता के साहस के साथ अपनी सामूहिकता का चुनाव करने की स्वतन्त्रता अर्जित करता हूँ. इसके साथ यह जोड़ना भी ज़रूरी है कि विश्वविद्यालय एक ऐसा परिसर है जहां  ‘अलोकप्रिय’ और ‘अनुपयोगी’ विचारों को  पनपने और पल्लवित होने की  अनुकूल जलवायु  प्राप्त होती है. इसके लिए अनिवार्य हो उठता है  प्रभुत्वशाली और स्वीकृत विचारों का विरोध.विरोध या असहमति इस प्रकार विश्वविद्यालय का अस्तित्व-तर्क है. इसीलिए विश्वविद्यालय अनुशासन और दंड के विधान से बंधे नहीं होते.

विश्वविद्यालय के इस  विचार में  पिछले कुछ वर्षों से तेजी से क्षरण हो रहा है. इसके पीछे ज्ञान की विशेष अवधारणा सक्रिय है जो उसे सामाजिक-भौगोलिक और सांस्कृतिक सन्दर्भों से स्वतंत्र करके देखती है.आश्चर्य यह है कि  राधाकृष्णन आयोग, मुदलियार आयोग, कोठारी आयोग और यशपाल समिति द्वारा बार-बार ज्ञान-सृजनकी प्रक्रिया में बारम्बार इन सन्दर्भों की भूमिकापर जोर दिए जाने के बावजूद भारत के विश्वविद्यालय तंत्र को  संचालित करने वाली संस्थाएं केंद्रीकरण की वकालत करती प्रतीत होती हैं. सबसे ताजा उदाहरण विश्वविद्यालय आयोग द्वारा अनुदान को इस शर्त के साथ जोड़ देने का है कि विश्वविद्यालय अपने सभी पाठ्यक्रमों को सेमेस्टर  के ढाँचे में ढालें. प्रश्न वार्षिक बनाम सेमेस्टर का नहीं, सैद्धान्तिक तौर पर  यह है कि जयप्रकाश नारायण विश्वविद्यालय, छपरा के लिए क्या ठीक है , यह कोई  केन्द्रीय संस्था कैसे तय कर सकती है. उसी तरह अध्यापकों के चयन के लिए  एक अनमनीय ढांचा बनाते ही  आयोग ने  तय कर दिया कि जो व्यक्ति इसमें फिट नहीं बैठते, उनसे विश्वविद्यालय हमेशा के लिए वंचित रह जाएं. अलग-अलग विश्वविद्यालय अपने अध्यापक चुनने के लिए अब अलग-अलग तरीके अपनाने को आज़ाद नहीं रह गए. सारे  विश्वविद्यालय और विभाग  अपने लिए अध्यापक का चयन एक ही  प्रक्रिया से करने को बाध्य हैं. इसमें ऊपर से समानता का सिद्धांत अपनाया जाता दीखता है लेकिन वास्तव में यह विश्वविद्यालय की स्वायत्तता का हनन करता है.

केन्द्रीकरण के इस आग्रह के पीछे संभवतः राजनीति-निरपेक्ष विकास के एक अनिवार्य घटक के रूप में ज्ञान की अवधारणा काम कर रही है. स्पष्टतः यह ज्ञान को एक अराजनैतिक गतिविधि के रूप में ग्रहण करने वाली समझ है. फूको जैसे विचारकों  ने सत्ता और ज्ञान के बीच के नाभिनाल सम्बन्ध को कुछ इस तरह उजागर कर दिया है कि अब इस पर किसी दूसरे तरीके से बात करना मुमकिन नहीं रह गया है. समाज के शक्ति-समीकरण के बीच ज्ञान-निर्माण  की प्रक्रिया अनेक द्वंदों से होकर गुजरती है. इसीलिए पुराने ज्ञानानुशासनों की हदें टूटती हैं. अंतरानुशासनिकता ज्ञान के उपभोक्ता छात्र को  अलग-अलग व्यंजन के स्वाद का आनंद उठाने के लिए आज़ादी देने का मामला नहीं है. यह ज्ञान को संगठित करने की एक अधिक संश्लिष्ट प्रक्रिया की ओर उसे सजग करने की युक्ति है. यह ज्ञानानुशासनों के बीच ऊंच-नीच की दर्जाबंदियों को तोड़ने का एक तरीका भी है.आप इसे ज्ञान को अधिक लोकतांत्रिक बनाने की एक पद्धति मान सकते हैं.

सजग अध्यापक इसीलिए अपने पाठ्यक्रम को कक्षा तक सीमित नहीं रखती. मसलन मुझे मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ को ठीक से समझने के लिए अपनी कक्षा में  ए. के. रामानुजन के रामायण संबंधी निबंध को दिल्ली विश्वविद्यालय की पाठ-सूची से हटाए जाने के प्रसंग को न सिर्फ लाना होगा , बल्कि शायद पूरी कक्षा को इस कदम के विरोध के लिए प्रेरित भी करना होगा.  जब मैं ऐसा कर रहा हूँ, तो मैं साहित्येतर विश्वविद्यालय विरोधी  राजनीति कर रहा हूँ या ज्ञानात्मक गतिविधि ? कक्षा में प्रश्न उठता है कि अज्ञेय के यात्रा-वृत्त ‘एक बूँद सहसा उछली’ में दूसरा अध्याय ही इटली में फासिज्म के अत्यंत आरंभिक काल में ही एक कलाकार लाउरो ड बोसिस के दुस्साहसी  विरोध का  वर्णन  क्यों है ? और क्यों अज्ञेय ने उसकी  उसकी चेतावनी के इस हिस्से को उद्धृत करना आवश्यक समझा , ‘ क्या नेता और क्या साधारण युवक , सभी समझते हैं कि फासिज्म अधिक दिन नहीं चल नहीं सकता और..अपने-आप मिट जाने वाला है, उसके लिए प्राण देना व्यर्थ है. लेकिन यह भूल है.’ इस अध्याय को उन्होंने  इस वाक्य से क्यों समाप्त किया, ‘ ‘’कौन कह सकता है कि आज भी कवि का स्वप्न उतना ही यथार्थ और उतना ही शस्त्र संपन्न नहीं होता-नहीं है?’ इन प्रश्नों का उत्तर क्या मैं मात्र अपनी ‘कक्षा’ की सीमा  में दे सकता हूँ, या क्या सिर्फ ‘साहित्य’ के ‘दायरे’ में रह कर खोज सकता हूँ?  यूरोप ने बोसिस  के १९३१ के इन शब्दों को न समझने के चलते जो कीमत चुकाई , उसे भारत के  आज के नवयुवक को कैसे समझाया जाए जो लोकतांत्रिक निश्चिंतता में जी रहा है? क्या मुझे उसे लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्य के शरीर के  भीतर पल रहे फासिज्म के कीटाणुओं को देख पाने की निगाह नहीं देनी होगी और राष्ट्रवाद के प्रति उत्साह को लेकर भी सावधान नहीं करना होगा  ? क्या इसके लिए मुझे छात्रों को संजय काक की कश्मीर पर बनी उस फिल्म को देखने को नहीं कहना होगा जिसे प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय ने नहीं प्रदर्शित होने दिया था? और अगर मेरा विश्वविद्यालय प्रशासन भी उसे रोके तो मैं क्या करूं? अगर मैं इस रोक की मुखालिफत न करूं तो अज्ञेय या मुक्तिबोध को पढ़ाने की अर्हता कैसे बचाए रखूँ? कुछ दिन पहले मेरे विश्वविद्यालय प्रशासन के द्वारा ही मजदूर-किसान शक्ति संगठन के कार्यक्रम की अनुमति रद्द किए जाने पर मैं चर्चा करूं या वह पाठ्यक्रम के बाहर का प्रसंग है?

अंतरानुशासनिकता की चर्चा जितनी ही बढ़ती जाती है, विश्वविद्यालयों को कक्षाबाह्य असुविधाजनक गतिविधियों से उतना ही पाक रखने की कोशिश की जाती है. अध्ययन को कक्षा-व्याख्यान, आतंरिक मूल्यांकन, सेमेस्टर के अंत  के इम्तहान के बीच लगी जानेवाली एक दमतोड़ दौड़ की तरह पेश किया जाता है. इस दौड़ में छूट गया, लहूलुहान हुआ,उसे लेकर इस निर्वैयक्तिक व्यवस्था को, जिसका नाम विश्वविद्यालय है, परवाह करने की कोई आवश्यकता नहीं.

स्कूली स्तर पर तो इस सिद्धांत को हम मान लेते हैं कि ज्ञान कहीं बाहर से बन कर नहीं आता, जीवंत सामाजिक-सांस्कृतिक  सन्दर्भों में स्कूल –परिसर में छात्र और अध्यापक की स्वायत्त अंतःक्रिया में सृजित होता है, लेकिन २०१२ में दिल्ली विश्वविद्यालय में दीक्षित स्नातकों को उपाधि देते समय इसके ठीक उलट सन्देश सैम पित्रोदा देते हैं जब वे कहते हैं कि ज्ञान की श्रेष्ठ अंतर्वस्तु के निर्माण को लेकर समय न बर्बाद न करें, वह पहले से काफी उम्दा दिमागों ने तैयार कर रखा है और उसे  आधुनिक तकनीक से हासिल किया जा सकता है. अध्यापक का काम अब बस परिचारक का है. फिर वे स्नातकों का आह्वान  करते हैं कि वे विचार और बहस करने में वक्त जाया न करें, बस काम में जुट जाएं.

क्या श्रेष्ठ ज्ञान निर्माण में अब दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक की कोई  भूमिका नहीं बची  ? और  क्या मैं  गलत समझ बैठा हूँ  कि लोकतन्त्र का अनिवार्य घटक है विलम्ब,स्थगन और प्रतिरोध ! चिंतन और विचार इनके बिना संभव नहीं , स्वीकार का अधैर्य ज्ञान का विरोधी है. शंका, संदेह और प्रश्न के बिना ज्ञान-निर्माण संभव नहीं. किसी भी आधिकारिक ज्ञान-स्रोत को  वरीयता देना मेरे लिए संभव नहीं, मेरे लिए,  विश्वविद्यालय के ब्रह्माण्ड के  एक सदस्य के रूप में हर अध्यापक और छात्र की ज्ञान-प्रक्रिया में  सक्रिय भागीदारी ही उसकी प्रामाणिकता सिद्ध कर सकती है.

विकासातुर राष्ट्र राज्य को तेजी से काम करने वालों की दरकार होती है. वह विशेषज्ञों को ज्ञान और तकनीक के स्रोत के रूप में देखता है और साधारण जन को इनके वाहक उत्पादकों के तौर पर. विश्वविद्यालय इस विभाजन के सिद्धांत को अस्वीकार करता है. वह ज्ञान को एक ऐन्द्रिक, भौतिक स्पर्शात्मक गतिविधि के रूप में कल्पित और गठित करता है. विश्वविद्यालय को राष्ट्र-राज्य के  उपयोगितावादी मॉडेल का प्रतिरोध करना होता है. इसलिए वह खुद को राष्ट्र-राज्य की  सेवा में प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि उसके सामाजिक आलोचक के रूप में अपनी गतिविधियाँ गठित करता है. इसीलिए  वह अपने प्रतीक भी राज्य से उधार नहीं लेता. विश्वविद्यालय अपने किसी अतिथि  का स्वागत हथियार की सलामी दे कर करना पसंद नहीं करेगा, उसे समाज को शस्त्र के सौन्दर्य का बदल सुझाना होगा.

विश्वविद्यालय के लिए ज्ञान की प्रक्रिया एक गहरे दायित्व बोध से संवलित होती है. इसलिए वह खुद को सीमाबद्ध नहीं करता. न अनुशासन की सीमा , न किसी एक सामुदायिक पहचान की सीमा, न राष्ट्र की. विश्वविद्यालय का हर सदस्य अनिवार्यतः सार्वदेशिक होता है.

विज्ञान के ‘केयोस’ के सिद्धांत और ‘तितली-प्रभाव’ ने  मेरी विश्वविद्यालय और दुनिया के बीच के रिश्ते की मेरी समझ को समृद्ध किया है. अब मैं समझ पाता हूँ कि अगर मैं अपने बगल के विभाग के सहकर्मी के असहमति के अधिकार की रक्षा के लिए आगे नहीं बढ़ता हूँ, तो मैं गाजा में इस्राइली बमबारी के मामले में सरकारों की चुप्पी को  वैधता प्रदान करता हूँ. इन दोनों के बीच बड़ी दूरी लगती है, लेकिन अन्तरानुशासनिक अन्तःदृष्टि मुझे उसे पार करने का तरीका सुझाती है.

इसका प्रलोभन बना रहता है कि विश्वविद्यालय को विवादी स्वरों के शोरशराबे से शुद्ध एक करीने से लगाए हुए सुंदर उपवन का रूप दे दिया जाए. सारे विश्वविद्यालय एक-से लगें, इसका भी लोभ होता है. लेकिन ऐसा करते ही विश्वविद्यालय का प्राण-हरण कर लिया जाता है. अराजकता ही विश्वविद्यालय में जान भरती है. और वह बिना व्यक्ति को उसकी व्यक्तिमत्ता का अधिकार दिए संभव नहीं है. इन सबमें जोखिम है , लेकिन जोखिम लिए बिना तो इंसान बनना भी नहीं  होता , ज्ञान-निर्माण की  बात ही क्या !

4 Comments leave one →
  1. November 24, 2012 8:33 PM

    विलम्ब ,स्थगन और प्रतिरोध लोकतंत्र के संबलन के निमितार्थ है, उनसे लोकतंत्र की शिनाख्त सहज हो सकती है ,पर उसके अपरिहार्यता को मूल्य के रूप में स्वीकृति की बात ज्यादा सकारात्मक नहीं हो सकती …दोयम , सत्ता के केन्द्रीयकरन के प्रयत्न की सनक ने ”ज्ञान-संधान” के लोकतांत्रिक प्राविधि को हाशिए पर डाला है जिससे अनुषंगी तौर पर ज्ञान की वैधता भी संदिग्ध होती है …अकादमिक आबो-हबा को ”भागीदारी” का ऐश्वर्य से वंचित करना खतरनाक और चिंता-जनक है ..साथ ही साथ ज्ञान के plural fabric पर सीधा सीधा हमला भी . सांस्कृतिक भौगोलिक और सामजिक तत्वों के संक्रमण से अकादमियो की बचाने की कवायद ज्ञान के उपवन को बासीपन से बोझिल करेगी और उसके प्रासंगिकता का हस्वीकरण भी …सत्ता के इन प्रयत्नों के निहितार्थ भी स्पष्ट है …प्रस्तुत आलेख इसी प्रयत्नों की मुखालफत में मुखर होता सा है ….

  2. Kumar Saurabh permalink
    November 25, 2012 11:40 PM

    विश्विद्यालय के एक सजग प्राध्यापक को मानव संसाधन मंत्रालय के हस्तक्षेप से चिंता की प्रेरणा मिले, यह भी चिंताजनक है। आपकी यह चिंता बहुत पहले और लगातार प्रकट होनी चाहिए थी। यदि आपने ऐसा किया है तो यह मेरी सीमा हो सकती है कि मुझे इसकी जानकारी नहीं है।
    यह एक टिप्पणीकार की अच्छी टिप्पणी हो सकती है लेकिन विश्वविद्यालय के एक छात्र होने के नाते मैं आपकी पहचान महज एक टिप्पणीकार के रूप में नहीं कर सकता हूँ।

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