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जहाँ वे सेतु बनते हैं: मिहिर पंड्‌या

February 5, 2013

Guest post by MIHIR PANDYA

गणतंत्र दिवस की सुबह। अौर उस सत्र का शीर्षक था ‘विचारों का गणतंत्र’। अशिस नंदी पहले उदाहरण द्वारा विस्तार से समझाते हैं कि क्यों एक सवर्ण एलीट का भ्रष्टाचार हमारी बनायी ‘भ्रष्टाचार’ की मानक परिभाषाअों में फिट नहीं होता अौर क्यों सिर्फ दलित का भ्रष्टाचार ही ‘भ्रष्टाचार’ नज़र अाता है। इसलिए जब वे यह कहते हैं कि भ्रष्टाचारियों का बहुमत वंचित जातियों से अाता है तो वह यह कहते हुए वापिस पुरानी बात दोहराना ज़रूरी नहीं समझते कि यहाँ दोष उनका नहीं, ‘भ्रष्टाचार’ की उस भ्रामक परिभाषा का है जिसमें एलीट का भ्रष्टाचार फिट ही नहीं होता। इसे वह अंत में जवाब देने के लिए मिले दो मिनट के समय भी दोहराते हैं कि उनके उक्त कथन को दो मिनट पहले कही बात के संदर्भ में देखा जाए। जैसा नंदी ने बाद में भी कहा, अौर उनकी अध्ययन शैली से परिचित लोग यह जानते भी हैं, वे किसी भी वक़्त यह नहीं कह रहे थे कि भ्रष्टाचार की कोई जाति होती है, बल्कि वे भ्रष्टाचार को पहचानने अौर निर्धारित करने की जो प्रचलित समाजदृष्टि है, उसके पीछे छिपी जातिवादी मानसिकता को पहचानने की अोर इशारा कर रहे थे। यह तर्क प्रणाली समझने में थोड़ी जटिल हो सकती है, लेकिन इसकी कोई वजह मुझे फिर भी नज़र नहीं अाती कि ठहरकर, ज़रा सा समय देने पर भी यह बात समझ न अाए।

बाक़ी उनका कहना कि हमारे नितांत गैरबराबर समाज में भ्रष्टाचार कई बार उसे कुछ मानवीय बनाने का काम करता है (वे अौर तरुण इसे बाकायदे उदाहरणों द्वारा समझाते हैं), एक विचारोत्तेजक अवधारणा है जिससे अाप असहमत हो सकते हैं, बहस कर सकते हैं। लेकिन यही नंदी की खूबी भी है जिसे पहचाना जाना चाहिए। वे समाज में ‘मान्य’ अौर ‘प्रचलित’ तर्क श्रंृखलाअों को उनके सर के बल खड़ा कर देते हैं, अौर कितनी ही बार इस प्रक्रिया में विचार के, अपने समय अौर समाज को समझने के नए, अनछुए रास्ते हमारे सामने खुलते हैं। इसी सत्र में एक अत्यंत विचारोत्तेजक बात वे कहते हैं कि हमारे गणतंत्र में बराबरी का मैदान सिर्फ खेल, मनोरंजन, अपराध अौर राजनीति में बचा है अौर इसके समर्थन में कुछ अौर भी हंगामाखेज़ उदाहरण पेश करते हैं। वे अाशुतोष द्वारा भारतीय राजनीति में वंशवाद को सबसे बड़ा खतरा बताये जाने पर पलटकर याद दिलाते हैं कि नेहरु डाइनेस्टी की बात करते हुए हमें यह ऐतिहासिक तथ्य कभी नहीं भूलना चाहिए कि इंदिरा नेहरु के रहते मौजूद थीं लेकिन तब भी उन्हें नेहरू का उत्तराधिकारी नहीं बनाया गया था। नेहरू के जाने अौर इंदिरा के अाने में बड़ा अौर साफ़ दिखाई देनेवाला समय का अंतर था। अौर वे तो उन्हें ‘भोला’ समझ सिंडिकेड वाले अपने इस्तेमाल के लिए बाद में सत्ता में लाए थे। बाक़ी अन्य की तरह इंदिरा ने भी अपनी सत्ता लड़कर जीती थी। वैसे ही जैसे मुलायम अौर लालू प्रसाद ने। अाप उनसे बहस करना चाहें तो ज़रूर करें, जैसे पैट्रिक फ्रैंच उनकी बात को काटते हुए एक वाजिब तर्क सामने रखते हैं कि उनके 2004 अौर 2009 की लोकसभाअों के अध्ययन में यह बात उभरकर सामने अाई है कि राजनीति में पाया जानेवाला वर्तमान वंशवाद एक हालिया फिनॉमिना है जो सबसे ज़्यादा 45 साल से कम उम्र के सांसदों के समूह में दिखाई दे रहा है, अौर इसीलिए उसे सत्तर के दशक या नब्बे के दशक का उदाहरण देकर काटा नहीं जा सकता। लेकिन उसी अध्ययन को पढ़ने पर मैं यह भी जानता हूँ कि भारत की संसद अाज भी हिन्दुस्तान का सबसे विविधता से भरा व्यक्ति समूह है जिसमें हर तरह का वर्ग, जाति, लिंग, इलाकाई, भाषाई वैविध्य मिलता है जो अपने देश में अन्य कहीं देखना अाज भी दुर्लभ है। लेकिन इस सत्र से बाहर निकलकर देखें तो अाशिस नंदी के विचार सदा से कई असुविधाजनक सवाल हमारे अभिजन समूह के सामने रखते अाए हैं अौर हुअा बस इतना है कि इस सत्र ने उन्हें अचानक रास्ते के बीचोंबीच लाकर खड़ा कर दिया है।

क्या ‘भागीदारी वाला लोकतंत्र’, जिसमें सबका सत्ता में हिस्सा हो, अपने अाप में कोई ऐसा लक्ष्य है जिसे पाने के लिए लड़ा जाये? या फिर मेरे बहुत से दोस्तों की तरह अाप भी इसे समतामूलक समाज की स्थापना में सहायक एक माध्यम भर, रास्ता भर मान सकते हैं। यह एक अनंतिम बहस है जिसे हमें अाशिस नंदी से ही नहीं, अापस में भी, अौर खुद से भी निरंतर करनी चाहिए। बेशक यहाँ नंदी से सहमत होने वाले कम हैं, लेकिन जैसे ही हम उनके विचारों को बिना सुने खारिज करते हैं, हम हमारे देश की नब्बे के बाद की राजनीति अौर समाज में हो रहे परिवर्तन को जानने, समझने का एक महत्वपूर्ण प्रिज़्म खो देते हैं। ‘तरक्की’ अौर ‘हृास’ जैसी विषम जोड़ियों में बंटे मूल्यनिर्णय देती इतिहासदृष्टियों से बाहर निकलकर अपने समय को समझने का प्रिज़्म। पुस्तक “लोकतंत्र के सात अध्याय” में अपने अालेख ‘नई राजनीतिक संस्कृति’ में वह लिखते हैं, “भारतीय जनता का आधुनिक हिस्सा समझता है कि अंततः इस देश को उदारतावादी लोकतंत्र के पश्चिम यूरोपीय अनुभव की प्रतिकृति ही बन जाना है, तभी वह सत्रहवीं सदी के ज्ञानोदय से इक्कसवीं सदी के शुरूआती दौर के प्रौद्योगिकीय पूंजीवाद तक का रास्ता तय कर सकेगा। लेकिन आधुनिकतावादियों के दायरे से बाहर के लोग देश का भविष्य इस तरह पूर्वनिर्धारित नहीं मानते। उनके लिए विज्ञान के बढ़ते कदम या विकास के दर्शनीय सोपान ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि वे अपने लोकतांत्रिक भविष्य की गारंटी को भागीदारीवाले लोकतंत्र से जोड़ते हैं। भारत में विकास और आधुनिक विज्ञान-संबंधी विचारों के खिलाफ़ बढ़ता हुआ प्रतिरोध असल में इन विचारों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बीच अंतर्विरोधों की ही देन है। आज़ादी के विचार को वैज्ञानिक तर्कबुद्वि और सफल विकास में पूरी तरह अंतर्निहित मानने वालों को यह अंतर्विरोध विनाशकारी लगता है। लेकिन जो लोग इस घिसी-पिटी धारणा की भित्ति को अपने चारों ओर दरकते हुए देख रहे हैं, उनके लिए यह स्वागत योग्य है क्योंकि इससे ज्ञान-प्रणालियों और सामाजिक हस्तक्षेप के तरीकों का विविधीकरण और राजनीतिकरण हो रहा है।” तो वह यहाँ अपने समय को समझने के प्रचलित मुहावरों से से अागे जाकर एक नई प्रस्तावना हमारे सामने रखते हैं। यह प्रस्तावना समय के साथ हमारे लोकतंत्र में अाए बदलावों को पहले से निर्धारित ‘सही’ या ‘गलत’ के वायदों में देखने का निषेध करती है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण यह कि ये अपने समय अौर समाज की सिर्फ अालोचना करने के बजाए उससे एक संवाद कायम करने का रास्ता खोलती है। लेकिन ठीक प्रकृति की तरह, विचार की दुनिया में भी दुर्लभ होने के अपने खतरे हैं।

अगर अाप नंदी के अतार्किक विरोध को कुछ समय के लिए अलग रख देंं तो नज़र अाता है कि अाज उनकी विचारपद्धति के विरोध में एक अोर दलित अस्मिता से जुड़ा वैचारिक समुदाय खड़ा है, वहीं दूसरी अोर उनके विचार प्रगट करने के अधिकार का समर्थन करते हुए भी कई साथी विद्वान, जिन्हें हम मोटे तौर पर अाधुनिक-प्रगतिशील-वाम खेमे से जुड़ा कह सकते हैं, भी उनकी विचारसरणी से असहमति जताते हैं। योगेन्द्र यादव इंडियन एक्सप्रेस में अपने अालेख में लिखते हैं कि नंदी की तर्कपद्धति उनका तरीका नहीं है अौर वे उस तर्कपद्धति को समझने में मुश्किल महसूस करते हैं। अपूर्वानंद भी जनसत्ता में अपने अालेख के अंतिम हिस्से में “बहु-निंदित” अौर “तिरस्कृत” अाधुनिकता के महत्व का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि “शायद समय अा गया है कि हम सब, नंदी समेत, सामुदायिक अस्मिताअों के प्रतिपक्ष को भी देखें अौर उनके बरक्स बौद्धिक रूप से कुछ दशकों से फैशन से बाहर चली गई (पाश्चात्य अाधुनिकता की संतान) व्यक्ति की बुद्धि अौर विवेक को फिर से बहाल करने का प्रयत्न करें।” अौर सच कहूँ तो मैं अपने अाप को भी व्यक्तिगत जीवन अौर निर्णयों में इसी तार्किक जीवन पद्धति के साथ जुड़ा पाता हूँ। लेकिन यहाँ इन दो खेमों का साथ नंदी के विचार से असहमति जताना, यह महज संयोग नहीं है। अौर अगर अाप समझना चाहें तो यही नंदी के विचार को समझने का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र भी है। नंदी उस ‘अाधुनिकता’ के विचार की अालोचना अपने लेखन अौर विचारों में निरंतर प्रस्तुत करते रहे हैं जिससे यह दोनों खेमें कहीं न कहीं उम्मीद अौर जुड़ाव महसूस करते हैं। जहाँ अाज का दलित अस्मिताविमर्श इसके लिए तैयार नहीं है कि उसे अाधुनिकता के दायरे से बाहर रखकर देखा जाए, वहीं प्रगतिशील-वाम शायद अाज भी हमारी अाधुनिकता की ध्वस्त परियोजना को ही वर्तमान ‘हृास’ का कारण देखता है अौर उपाय रूप में अाज भी उस अाधुनिकता की किसी रूप में वापसी की उम्मीद करता है।

बेशक नंदी इन दोनों से अलग हैं। अौर यह वही थे जिन्होंने इन विपरीत लगते विचारों में अाधुनिकता के प्रति जो समान ललक दिखाई देती है उसे इतिहास में बहुत पहले पहचान लिया था, उपर उल्लेखित उनके लेख की ही एक पूर्ववर्ती पंक्ति है, “जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, बाबा साहब अंबेडकर में कितने ही विचारधारात्मक मतभेद रहे हों, लेकिन वह तीनों एक ऐसे राज्य की स्थापना पर एकमत थे जो सत्रहवीं शताब्दी के बाद यूरोप में पनपी राष्ट्र-राज्य की अवधारणा से थोड़ा ही अलग था।… स्वाधीनता के पश्चात उभरे अभिजात्य वर्ग की राज्य संबंधी अवधारणा राजनीतिक रूप से ‘विकसित’ समाजों में प्रचलित अवधारणा से उधार ली गई थी।” यहाँ अंबेडकर अौर नेहरू का उल्लेख है। लेकिन जो नाम यहाँ नहीं है, अौर जो उस वक़्त भी इस सर्वस्वीकार्य लगते राज्य की अवधारणा संबंधी विचार के विरोध में अकेला ही खड़ा था, उसे कभी भूलना नहीं चाहिए।

मैं यहाँ यह कहना चाहता हूँ कि तर्कवादी अाधुनिक जवाहरलाल नेहरू अौर बाबासाहेब अंबेडकर के होते भी अपनी नितांत अतार्किक लगती बातों अौर अविश्वसनीयता/ पागलपन/ मूर्खता की हद तक तक जाते लगते अद्वितीय विचारों/ हल/ निदानों के साथ जैसे गाँधी का होना अत्यंत ज़रूरी था, ठीक वैसे ही हमारे समय अौर समाज को समझने के लिए प्रगतिशील वाम अौर दलित अस्मिता के बीच अाशिस नंदी का होना भी बेहद ज़रूरी है। क्या है जो नंदी को खुद अपने अकादमिक विचारक समाज में विरला बनाता है? यह है विचार की दुनिया में leap of faith लेने की उनकी अनोखी हिम्मत। अगर मैं, उनके अौर मेरे पसंदीदा खेल क्रिकेट से प्रतीक उधार लेकर कहूँ तो मेरे लिए वह वैचारिक जगत के वीरेन्दर सहवाग हैं। उतने ही असंभव, उतने ही सरल, उतने ही दुर्लभ। जैसे सहवाग खुद व्यक्तिगत खेल में रिस्क लेकर अपनी टीम को असंभव लगती जीतों तक पहुँचाते रहे हैं, वे खुद वह वैचारिक ‘रिस्क’ लेते हैं जिसे धारण करने की हिम्मत अौर कुव्वत शायद अौर किसी में नहीं, लेकिन इसी वजह से उनके पाठक उस असंभव लगते समझ के बिन्दु तक पहुँच पाते हैं जहाँ से अपने समय अौर समाज को देखने का एक नितांत भिन्न लेकिन बहुत साफ़ नज़रिया मिलता है। वे अपनी दुर्लभ कल्पनाशीलता से विचार की नई ज़मीन तोड़ते हैं। वे अपने अध्ययनों में तथ्यों के साथ मान्यताअों, लोक विश्वासों, सामुदायिक प्रतीकों तथा लोकप्रिय अफवाहों तक को शामिल करते हैं अौर हम अाधुनिक शिक्षा पाए शोधकर्ताअों को अपनी असहमति में खड़ा कर लेते हैं। लेकिन मानना होगा कि इसी वजह से वे कई बार समाज की उन बन्द गिरहों को खोल पाते हैं जिन तक अकादमिक अध्ययन के सख्त अनुशासन में बँधकर पहुँच पाना शायद संभव नहीं होता। डी अार नागराज ने उनका परिचय लिखते हुए कभी कहा था, “नंदी के बारे में अंतिम रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। वे अनुमान से पूरी तरह परे हैं।”

निश्चितताअों के काल में एक अनिश्वित विचार का होना ज़रूरी है। उनका होना, उनसे कहीं ज़्यादा हमारे इस ‘सर्वज्ञाता’ समय के लिए, हमारे लिए ज़रूरी है।

(A revised version of an article published in Jansatta.)

2 Comments leave one →
  1. February 5, 2013 9:04 PM

    Sir although corrupts are every where in India. It seems corruption is become part of Indians DNA and blood. But Ashish Nandy might have these Money minting super stars of today when he gave that controversial comment. Most of these leaders belong to Ashish Nandy love groups like Mayawati,her brother Anand Kumar, Mulayam Singh Yadav, Babu Singh Kushwaha, Lalloo Yadav, Meera Kumar, Shibu Soren, Madhu Konda, Yedurappa, Kumarmanglam, Kalmadi, Chagan Bhujgal, Sharad Panwar, Karunanidhi, Kazimoi, A. Raja, Bangaru Laxman, Ajit Jogi, Sushil Shinde, Dayanidhi Maran, A. Randaus, Sukhdev Thorat, Mrs.Neera Yadav, Justice Nilmala Yadav, Justice Dinakaran, Justice BalaKrishnan, Chautalas.

    • February 7, 2013 2:30 AM

      Dr. Yogesh, You yourself contradicts your own first point when you mention all these names here and conveniently leave many others. And for me, that’s precisely the mentality we have in our society on which Nandy was commenting.

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