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राष्ट्रवादी न्याय से करुणा की विदाई

February 12, 2013

“अगर हम ‘लोकतांत्रिक सरकारों के छिपे इरादों और गैरजवाबदेह खुफिया शक्ति संरचनाओं की जांच करने और उन पर सवाल उठाने से इनकार करते हैं तो हम लोकतंत्र और मानवता, दोनों को ही खो बैठते हैं.” पत्रकार जॉन पिल्जर का यह वाक्य आज हमारे लिए कितना प्रासंगिक हो उठा है! हमें नौ जनवरी को खुफिया तरीके से अफज़ल गुरु को दी गयी फांसी के अभिप्राय को समझना ही होगा. काम कठिन है क्योंकि इसे लाकर न सिर्फ़ प्रायः सभी संसदीय राजनीतिक दल एकमत हैं बल्कि आम तौर पर देश की जनता भी इसे देर से की गई सही कार्रवाई समझती है.

नौ जनवरी के दिन के वृहत्तर आशय छह दिसम्बर जैसी तारीख से कम गंभीर नहीं क्योंकि इस रोज़ भारतीय राज्य ने गांधी और टैगोर की विरासत का हक खो दिया है.अगर अब तक यह साबित नहीं था तो अब हो गया है कि भारत की ‘संसदीय लोकतांत्रिक राजनीति’ का मुहावरा उग्र और कठोर राष्ट्रवाद का है. और राजनीतिक दलों में इस भाषा में महारत हासिल करने की होड़ सी लग गयी है.

आतंकवाद के हर निशान को मिटा देने और उस रास्ते में किसी भी रुकावट को बर्दाश्त न करने को प्रतिबद्ध राष्ट्र-राज्य में कश्मीर की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के नईम अख्तर के इस चिंतित स्वर को सुनना मुश्किल है, “मैं जुर्म और उसके कानूनी नतीजों को समझता हूँ लेकिन एक इंसान के खिलाफ सबूत और न्यायोचित सुनवाई की नैतिकता का सवाल भी है. और क्या यह सच नहीं कि रहम भी भारतीय कानूनी फ्रेम का एक हिस्सा है?”

रहम, करुणा या दया अभी अप्रासंगिक शब्द और अवधारणाएं हैं. यह पता चलता है अफ़ज़ल गुरु को गई फांसी और इसकी इत्तला अफ़ज़ल के परिवार को न दिए जाने और पत्नी और बच्चे से आख़िरी मुलाक़ात से उसे वंचित लिए जाने से. इस सरकारी बयान से कि परिवार को डाक से खबर भेज दी गयी थी. उसके पहले राष्ट्रपति द्वारा अफ़ज़ल गुरु की रहम की अपील को राष्ट्रवादी कठोरता के साथ ठुकरा दिए जाने से.

हमारी सबसे बड़ी अदालत ने बावजूद इस तथ्य के कि अफ़ज़ल गुरु ने किसी को खुद नहीं मारा और वह हमले में सीधे शामिल न था, उसके कबूलनामे के आधार पर, जो अब निरस्त कर दिए गए कानूनी प्रावधानों के अंतर्गत लिया गया था और उसके मोबाईल फ़ोन रिकॉर्ड को सबूत मान कर उसकी फांसी की सजा बरकरार रखने का फैसला किया और उसने अपने निर्णय की समीक्षा करते समय भी अफ़ज़ल गुरु की अपने वकील को लंबी चिट्ठी और उसके दूसरे वक्तव्य को महत्वपूर्ण नहीं माना.

बावजूद इस बात के कि यह फांसी उच्चतम न्यायालय की अंतिम सहमति के साथ दी गई, यह प्रश्न बचा रहता है कि क्या इन्साफ किया गया? और इस इन्साफ से क्या हमने आख़िरी तौर पर रहम को निकाल बाहर कर दिया है ? उस तकनीकी और कानूनी प्रावधान को भी याद रखें, जिसका इस्तेमाल करने का मौक़ा अफ़ज़ल को नहीं दिया गया, जिसके तहत राष्ट्रपति द्वारा रहम की अपील ठुकराने के फैसले की भी समीक्षा की मांग की जा सकती है.

अफ़ज़ल गुरु की फांसी के के प्रकरण में तथ्य क्या हैं ? 13 दिसम्बर , 2001 को भारत की संसद पर हमला किया गया जिसमें एक माली सहित आठ सुरक्षाकर्मी मारे गए और जवाबी कार्रवाई में पाँचों हमलावर भी मार डाले गए. असाधारण त्वरा के साथ पंद्रह दिसंबर को अफ़ज़ल गुरु और दिल्ली विश्विद्यालय के एक कॉलेज में अध्यापक एस. ए. आर. गीलानी को पुलिस ने गिरफ्तार किया. कुछ रोज़ बाद अफसान गुरु और उसके पति शौकत हुसैन गुरु को भी गिरफ्तार किया गया. संचार माध्यम लंबे समय तक गीलानी को आतंक का प्रशिक्षण देने वाला और इस मामले में केन्द्रीय व्यक्ति बताते रहे और उनके बेकसूर साबित होकर छूट जाने के बाद भी इस दुष्प्रचार के लिए उन्होंने माफी नहीं माँगी और न गीलानी की प्रतिष्ठा को हुई हानि की कोई भरपाई की गयी. ज़ी टी. वी. ने इस पूरी घटना पर एक फ़िल्म बनाई जो जांच के दरम्यान ही प्रदर्शित की गई और जिसे अदालत ने न्याय की कार्रवाई में बाधा नहीं माना. गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने सारे नियमों को ताक पर रखकर संचार माध्यमों के सामने अफ़ज़ल को पेश किया. उसने इस हमले की साजिश में शामिल होने की बात सबके सामने कबूल की . दिल्ली का पुलिस अधिकारी राजबीर सिंह अफ़ज़ल पर बुरी तरह चीखा जब उसने कहा कि इस मामले में गीलानी कहीं से शामिल नहीं थे . उसने पत्रकारों से कहा कि अफ़ज़ल के बयान के इस हिस्से को प्रसारित न किया जाए. सारे चैनलों ने आज्ञापालन करते हुए इस महत्वपूर्ण अंश का प्रसारण नहीं किया . पत्रकार शम्स ताहिर खान ने बाद में अदालत के सामने यह बात कबूल की. इस तरह पत्रकार जगत ने सत्य उद्घाटित करने के अपने मूल कर्तव्य की तथाकथित ‘राष्ट्रीय हित’ के आगे उपेक्षा की. यह भूलकर कि अगर वह ऐसा करता तो पुलिस की जांच की आपराधिक बेईमानी उजागर होती और यह साफ़ होता कि वह दरअसल सच गढ़ रही थी, खोज नहीं रही थी. आज तक पत्रकारों ने पुलिस के साथ इस मुजरिमाना मिलीभगत के लिए माफी भी नहीं माँगी.

सारी गिरफ्तारियां और उनकी परिस्थितियाँ संदेह के दायरे में थीं. पाया गया कि पुलिस ने गिरफ्तारी के जाली मेमो बनाए. खासकर अफ़ज़ल गुरु के प्रसंग में यह जाहिर हो गया और अदालत ने भी नोट किया कि पुलिस ने जांच के दौरान कई प्रक्रियागत गलतियाँ कीं. राष्ट्रीय सुरक्षा के ऐसे गंभीर प्रसंग के लिए क्या ये असंगतियाँ नज़रअंदाज की जानी चाहिए थीं? पुलिस के कई दावे गलत पाए गए.

अफ़ज़ल गुरु को इस साजिश का सरगना माना गया. सिर्फ उसके फोन रिकॉर्ड और उसके पास पाए गए लैप टॉप के आधार पर. फोन रिकॉर्ड से यह साबित किया गया कि मारे गए ‘आतंकवादियों’ के साथ अफज़ल गुरु का लगातार संपर्क था. लेकिन बाद में अफजल गुरु की इस मांग पर अदालतों ने ध्यान नहीं दिया कि उसके फोन रिकॉर्ड की जांच की जाए क्योंकि तब उससे यह भी साबित होता ‘आतंकवादियों’ के साथ निरंतर संपर्क में रहने वाले अफ़ज़ल गुरु का पुलिस की स्पेशल टास्क फ़ोर्स के साथ भी निरंतर संपर्क था. यह एक महत्वपूर्ण तथ्य हो सकता था और इससे अफ़ज़ल की यह बात साबित होती जो उसने अपने वकील सुशील कुमार को लिखे ख़त में और अब ‘कारवाँ’ के संपादक विनोद जोस को दिए साक्षात्कार में कही थी कि वह जे.के.एल.ऍफ़. का सदस्य था और बाद में उसने आत्मसमर्पण कर दिया था. वह एक सामान्य ज़िंदगी बिताना चाहता था. लेकिन जम्मू-कश्मीर में एक ‘पूर्व-स्वतंत्रता-समर्थक’ का सामान्य जीवन जीना वहां की पुलिस, स्पेशल टास्क फ़ोर्स और ‘आफ्सा’ नामक क़ानून से सुरक्षित सेना के चलते संभव नहीं है. उसे गाहे-बगाहे पुलिस उठा लेती थी, पैसे की वसूली करती थी, तरह-तरह से यंत्रणा देती थी. उससे वह अपनी सुविधा के और ‘राष्ट्रीय हित’ के दूसरे काम भी लेती रही थी. इन्हीं में से एक काम था , संसद पर हमले में मारे गए मोहम्मद को कश्मीर से दिल्ली ला कर यहाँ मकान दिलाना और उसके लिए एक कार खरीदना. अफ़ज़ल ने कहा कि उसने भारत की सुरक्षा एजेंसियों के दबाव में यह काम किया. अफ़ज़ल का यह आरोप संगीन था और इसे बिना जांच के नहीं जाने दिया जा सकता था क्योंकि इससे संसद पर हमले की राजकीय कथा में छेद हो जाते हैं. पर पुलिस की जांच को जिसके लगभग हर पहलू को अदालत में ही शक के दायरे में आ गया था, सही मान लिया गया. ध्यान दें कि अदालत ने ही पुलिस के सामने दिए गए अफजल के कबूलनामे को भी विश्वसनीय नहीं माना. .

अदालत के फैसले के अध्ययन से जाहिर है कि अफ़ज़ल हमले में शामिल नहीं था, उसने खुद किसी की ह्त्या नहीं की, कि पुलिस द्वारा हासिल किया गया उसका कबूलनामा भरोसेमंद सबूत नहीं है. फिर भी मात्र परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर अदालत ने अफजल को संसद पर हमले का षड्यंत्रकर्ता मान कर ‘लोकतंत्र के मंदिर’ पर आक्रमण के जघन्य अपराध के लिए दोषी करार दिया और इसके लिए फांसी से कम सजा पर्याप्त नहीं पाई.

पुलिस के मुताबिक़ ही इस हमले के तीन मुख्य षड्यंत्रकर्ताओं को वह पकड़ नहीं पाई. बाद में दावा किया कया कि इन तीन में से एक,गाजी बाबा, एक मुठभेड़ में मारा गया. बाकी दो कहाँ हैं ? यह ताज्जुब की बात है हमारी सबसे बड़ी अदालत , जो राजकीय एजेंसियों को लगातार फटकार लगाती रही है कि वे अपना काम ठीक से नहीं करतीं, राष्ट्रीय सुरक्षा के इस महत्वपूर्ण मामले में हमारी पुलिस के निकम्मेपन पर कारगर ढंग से नाराज़ नहीं हुई. यह भी कि पुलिस इन्टरपोल की मदद से इस हमले के भारत के बाहर के सूत्रों को भी उजागर नहीं कर पाई. क्या असली सूत्रधारों को पकड़ पाने में नाकामयाब पुलिस ने आसान शिकार पकडे, जैसे अफ़ज़ल, जो पहले से ही उनके कब्जे में था?

षड्यंत्र की कथा एक थी. पात्र कई थे. दो मुख्य पात्र थे एस.ए.आर. गीलानी और अफ़ज़ल गुरु. देश के कलेजे को ठंडक पहुंचाने की जल्दी में गीलानी को भी लगभग फांसी दे ही दी गयी थी. उनके लिए देश के सबसे प्रभावशाली वकीलों का दल औरअध्यापकों और अन्य नागरिकों की एक पूरी टीम के अथक उद्यम से पुलिस की कहानी के कहानीपन का पर्दाफाश हो सका और मीडिया द्वारा भी मुजरिम साबित कर दिए गए गीलानी फांसी के फंदे से बच पाए. लेकिन अभी भी हमारा मीडिया उन्हें अरबी का अध्यापक नहीं कहता, संसद पर हमले का अभियुक्त कहता है, मानो उसे उनके बच जाने का ग़म हो!

अफ़ज़ल को वकीलों और भारत के सभी समाज की यह मदद न मिल पाई. उसने सबसे बड़ी अदालत को लगाई गुहार और बाद में रहम की अपील में बार-बार कहा कि वह गरीब था, खुद वकील नहीं कर सकता था और उसे उसकी पसंद के वकील नहीं मिले. उसे एक निहायत ही कमजोर और प्रायः उसी के खिलाफ विद्वेष से भरे वकील के हाथों छोड़ दिया गया. अफ़ज़ल ने यह भी कहा कि साक्ष्यों की प्रामाणिकता की जांच करने वाली आरंभिक अदालत जो बाद में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बन गए न्यायमूर्ति एस.एन. धींगड़ा की थी, प्रायः उसके प्रति पूर्वग्रह ग्रस्त थी. अफ़ज़ल की यह शिकायत, जो इस अदालत से थी, इससे लगभग साबित हो जाती है कि उन्हीं अवकाशप्राप्त न्यायमूर्ति धींगड़ा ने अफज़ल की फांसी के बाद बयान देना ज़रूरी समझा कि उन्होंने तो उसे कितनी चुस्ती से फांसी की सजा सुनाई थी लेकिन अफ़सोस उस पर अमल करने में इतनी देर लगा दी गई ! तो क्या अफजल इस वजह से आसान शिकार हुआ कि वह एक कश्मीरी था , इस कारण हिन्दुस्तानियों को मिलनेवाला संदेह का लाभ उसे नहीं दिया सकता था और उसका ‘दागदार’ अतीत उसे अच्छा मुजरिम साबित करता था ?

जो हो , हमारी सबसे बड़ी अदालत ने एक दागदार रिकॉर्ड वाले पुलिस अधिकारी के नेतृत्व में की गई निहायत ही संदिग्ध जांच के आधार पर मात्र परिस्थितिगत साक्ष्यों के सहारे अफ़ज़ल को इसलिए फांसी दी कि सिर्फ और सिर्फ फांसी से ही इस देश की ज़ख़्मी सामूहिक अंतरात्मा संतुष्ट हो सकती थी ! और इस फैसले को सुधारने का आख़िरी मौक़ा इस देश की सत्ता ने ठुकरा दिया. कुदरत की सबसे बड़ी नेमत, यानी एक ज़िंदगी को , जिसे खतम करने की किसी भी इंसान को सख्त मनाही है, बुझा देने का जो औचित्य दिया गया वह इस देश की नींद पर प्रेत की तरह मंडराता रहेगा.

हर पीढ़ी ज़िंदगी के अपने उसूल चुनती है. आज़ाद हिन्दुस्तान की बुनियाद रखने वाले हमारे पुरखों ने इंसानी अच्छाई की बुनियादी सच्चाई पर भरोसे और करुणा को चुना था. हमने उस करुणा को ‘घर से हँकाल’ दिया है. फिर भी क्या हम ज़िंदा रह गए हैं?

( First published in Jansatta, 12 February, 2013)

5 Comments leave one →
  1. Aditya permalink
    February 13, 2013 2:58 PM

    वो आ गए हैं, तुम्हारी और मेरी ज़िन्दगी पे अपने अधिकार का ऐलान करने। वो आ गए हैं हमारी जीवनरेखा नापने, मिटाने, दुबारा आंकने। वो आ गए हैं तुम्हारे भविष्य में तुम्हारे अतीत के पापों की सज़ा के खौफ से तुम्हारे आज को खौफज़दा करने। उनसे रहम की उम्मीद मत रखना, उनकी राजनीति में तुम्हारे मानव अधिकारों, तुम्हारे आंसुओ, तुम्हारे परिवर्तन के वादों की कोई जगह नहीं है। तीन महीनो में दो अमानविक अवैधानिक गोपनीय मृतुदंड देकर उन्होंने अपना इरादा साफ़ ज़ाहिर कर दिया है।

    इतिहास गवाह है, हुकूमत के हाथों सज़ा पाने वालों का कुसूर अक्सर सिर्फ इतना होता है की वो हुकूमतगर्दों में से एक नहीं होते, अलग होते हैं – अलग जाति, अलग भाषा, अलग धर्म, अलग वर्ग, अलग रंग, या अलग सोच के। बात हिन्दू मुसलमान और सिख की नहीं है, बात जनेउ, दाढ़ी और किरपान की है। अगर तुम उनमे से एक हो तो तुम्हे डरने की कोई ज़ुरूरत नहीं है। पर तुम उनसे अलग हो तो तुम सिर्फ तब तक जिंदा हो जब तक तुम उनकी सियासत को स्वीकार करते रहो, उनकी हाँ में हाँ मिलाते रहो। मृत्युदंड जुर्म करने की सज़ा नहीं है, मृत्युदंड इनकार करने की सज़ा है।

    तुम्हारी, मेरी और उनके हर गुलाम की ज़िन्दगी के वो ब्रह्मा-विष्णु-महेश हैं। वो हमारे सामने सर-कटी लाशें फेंकते रहेंगे और हमें इनकार का अंजाम दिखाते रहेंगे। शायद हम उनकी चाल तब तक नहीं समझेंगे जब तक उनके रथ का पहिया हमारी गर्दन पर से नहीं गुज़रता। जुर्मो की सज़ा सुनाने और देने में वो अपने ही कानूनों का उल्लंघन कर रहे हैं, क्यों की उनका मकसद कानून की रक्षा करना है ही नहीं, उनका मकसद सिर्फ अपने राज को क़ायम रखना है।

    आवाज़ उठाने में जान खो बैठने का खतरा है। लेकिन आवाज़ उठाना ज़रूरी है। ताकि जब तुम उनके मत से सहमत न हो, तब वो तुम्हे भी हमेशा के लिए खामोश न करने पाएं।

  2. February 13, 2013 8:32 PM

    Congratulations Prof Apoorvanand for a brilliant, sensitive and insightful account of this crime against justice and humanity.The Indian state’s hands are soaked in the tears and blood of an innocent man.

    • Aditya permalink
      February 13, 2013 10:10 PM

      And they have made all of us a partner in that murder.

  3. February 15, 2013 5:34 PM

    हमें जल्दी ही उस दिन का सामना करना होगा जब पुलिस सच नहीं ढूंढेगी वरन कहानियां बनाकर किसी को भी फँसा देगी और देश उसे फंसी दे देगा | असली दुश्मन /दोषी विदेश में बैठ कर भांगड़ा कर रहे होंगे|

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