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माँ भारती के वीर सपूतों की रेप फंतासियाँ

February 25, 2016

पेश हैं सोशल मीडिया से दो, फ़क़त दो, बानगियाँ उस नए संस्कारी राष्ट्रवादी नायक की जो  खुद को ‘माँ भारती’ का दीवाना सपूत बताता है. उसकी दीवानगी का आलम यह है कि वह अपनी माँ की खून की प्यास बुझाने के लिए किसी भी औरत से बलात्कार करने पर उतर आने को तैयार है. यह कौन माँ है इस पर तो हम थोड़ी देर में आयेंगे, पहले ज़रा इन सपूतों की करतूतों पर नज़र डाल लें.

ऊपर आईटम नंबर 1: बंगाल के मालदा जिला के एक ब्राह्मण दीवाने, नाम सौरव भट्टाचार्य, का एक फेसबुक मंतव्य. जनाब पहले फरमाते हैं: “चूतिया साला, स्टैंड विद जे एन यू…साला हारामखोर (बंगला मिश्रित होने के कारण हिज्जे अलग हैं)…एकी स्लोगन चलता, बंद  करो जे एन यू.” उनकी इस सुसंस्कृत ज़बान पर ऐतराज़ जताते हुए एक महिला (जिनका नाम काली स्याही से छुपाना पड़ा है) ने उन्हें टोका, तिस पर वे आपा खो बैठे. उनका जवाब मुलाहिज़ा फ़रमाइए:

(ऊपर लिखे रोमन बंगला का हिंदी तर्जुमा): ए रंडी (दरअसल ‘चोदोन मेये’ का अक्षरशः अनुवाद मुश्किल है), ज़्यादा जेएनयू  जेएनयू  किया तो तेरे घर घुस कर साली तुझे रेप करूंगा ही. घर में तेरी माँ बहन को भी नहीं बख्शा जायेगा, साली बहुत अंग्रेजी चोद रही है. समझ लेगी तब लौड़ा एंटीनैशनल किसे कहते हैं, बोकचोदा (यह खालिस बंगला है) लड़की. अंग्रेजी चोद रही है, लौड़ा तेरी जैसी रंडियों को, छिनालों को देश के बहार फेंक आना चाहिए – पुरे कुनबे को.

    आईटम नंबर 2: पटियाला हाउस अदालत में लगातार दो दिन पत्रकरों पर हमले के विरोध में बम्बई में  पत्रकारों ने प्रदर्शन का ऐलान किया. नीता कोल्हटकर द्वारा इसकी खबर ट्विटर पर दी गयी, जिसके जवाब में अमरेन्द्र कुमार सिंह नामक एक और संस्कारी राष्ट्रवादी मैदान में उतर आते हैं. इनकी मधुर वाणी भी सुन ही लीजिये. अमरेन्द्र सिंह फरमाते हैं:

आप के साथ हार्ड गैंगरेप होगा. होस में रहो, भारत माँ के साथ गद्दारी मत करो. देशद्रोह ??? की इजाज़त नहीं है.

दोनों मंतव्यों में एक बात साफ़ है. कहीं एक ही देशभक्त एकबारगी  घर भर की तमाम महिलाओं का रेप करने का सपना देख रहा है और उस बाबत धमकी दे डालता है, तो वहीं दूसरा एक ही देशद्रोही महिला पर पूरा का पूरा गैंग उतारने की धमकी दे कर अपनी आग बुझाने की ठान लेता है. फिर भी समानता यह है कि दोनों अपनी माँ भारती के नाम पर यह करना चाहते हैं. हमारे देश में ऐसे देव-देवियों की कमी नहीं है अपने भक्तों से बाज़ वक़्त अजीबो-ग़रीब मांग करते हैं. इन राष्ट्रभक्तों की माँ अमूर्त है. उस माँ का कलेजा तभी ठंडा होता है जब उसके आस पास असल हाड़ मांस की तमाम औरतें बेआबरू कर दी जाएँ. याद है जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष  कन्हैया के 9 फरवरी के भाषण की आख़िरी पंक्तियाँ जिसमे वह कहता है कि किस तरह उसकी माँ और बहन को गंदी गंदी गलियाँ दी जा रही हैं और उसका यह दावा कि जिस ‘भारत माँ’ में उसकी खुद की माँ शामिल नहीं वो उस भारत माँ को क़ुबूल नहीं कर सकता है? यह हालत सिर्फ कन्हैया की नहीं है. कमोबेश जिसने भी इन राष्ट्रभक्तों से मतभेद का इज़हार किया उसीकी माँ और बहन  तक मामला पलक झपटते ही पहुँच गया. आख़िर अभी दो रोज़ पहले ही उमर खालिद की बहन को भी गैंग रेप की धमकियां देने का मामला सामने आया है.

यहाँ हम ने जगह की कमी और अपनी सुविधा के लिए दो ही ऐसे सपूतों के उदाहरण रखे हैं, हालाँकि हम सबके तजुर्बे में यह नए देशभक्तों की आम भाषा है.  यूँ तो बलात्कार या रेप पर सिर्फ इन देशभक्तों का एकाधिकार नहीं हैं मगर इन रणबांकुरों की खासियत यह है कि कि ऐसा अपनी माँ की शान में चार चाँद लगाने के लिए करते हैं, या करने  की धमकी देते हैं. कोई और मर्द ऐसा करे तो कम अज़ कम माँ के सामने शायद थोड़ी बहुत शर्मिंदगी महसूस करेगा. इस फ़र्क को, इस नए अंदाज़ की राष्ट्रभक्ती की गुफ़्तार को एक औरत के बेहतर भला कौन  समझ सकता है, जिसे दिन रात उनकी गली गलौज झेलनी पड़ती है? लिहाज़ा अपनी तरफ़ से कुछ न जोड़ते हुए स्वाती मिश्रा की ज़ुबानी उनके बेबाक हालिया लेख से यह चंद उद्धरण पेश  हैं:

ना आपकी भाषा संयत है और ना आपके इरादे सही हैं। भारत का नाम लेकर आप चीखते हैं, लेकिन भारत की आत्मा को ही नहीं समझते। इस बहुसंस्कृति वाले देश का लोकतंत्र आपको चिढ़ाता है। आपका विरोध मां-बहन की गाली पर ख़त्म होता है। आपका विरोध सबको देशद्रोही और पाकिस्तान का दलाल कहता है। रंडी और नपुंसक आपकी शब्दावली का अहम हिस्सा हैं। आपकी पार्टी और आपकी विचारधारा सही, बाकी सब अलग
मुझे खुशी है कि आपके जैसी नहीं हूं मैं और इसीलिए देशभक्त भी नहीं हूं। आपके लिए मैं देशद्रोही सही, लेकिन अपनी इंसानियत से बहुत खुश हूं मैं। नीचे कॉमेंट बॉक्स में जाकर आप जो गालियां देंगे, उसके लिए आपका अग्रिम शुक्रिया। आपके रंडी और ग़द्दार कहने को मैं बुरा नहीं मानती। आप ‘सौ-सौ फूलों को खिलने दो और सौ-सौ विचारों को पनपने दो’ में भरोसा नहीं रखते इसलिए आपके आसपास की हवा में अलग-अलग फूलों की महक नहीं है। आपके विचार सैकड़ों साल पुरानी सोच का पोखरा बन गए हैं जिसका पानी लगातार सड़ रहा है और इसी कारण वहां नफरत के कीड़े बिलबिला रहे हैं। ऐसे पोखर से तो दुर्गंध ही निकलेगी। वही फैला रहे हैं आप हर जगह, यहां भी फैलाइए।
स्वाती मिश्रा के लेख की एक बात ख़ास तौर पर गौरतलब है. वे इस राष्ट्रभक्ति के इस अंदाज़ को ‘नयी देशभक्ती’ के रूप में पहचानती हैं जो उस देशप्रेम से बिलकुल अलग है जिसे लाखों करोड़ों लोग बड़े स्वाभाविक ढंग से रोज़ाना जीते हैं. लिहाज़ा उनका कहना है,
मुझे आप खुशी से देशद्रोही कह सकते हैं। यही मेरी प्रवृत्ति है। यही मेरा चरित्र है। आपकी देशभक्ति से इतनी घृणा हो गई है कि देशद्रोही का आरोप मुझे सुकून देता है। आपकी धर्मांधता और शून्यता से पैदा हुई खीझ से देशभक्ति शब्द की सकारात्मकता मेरी नज़र में ख़त्म हो चुकी है। देशभक्ति की आपकी परिभाषा इतनी खोखली लग रही है कि मुझे देशद्रोह लुभाने लगा है। आप मुझे देशद्रोही ही मानिएगा।
इस नयी देशभक्ति का आधार गुंडई है, उसमें औरतों के प्रति नफरत है, दलितों और निचले तबकों  के प्रति हिक़ारत है और अल्पसंख्यकों को तो वह दुश्मन ही मान कर चलता है. एक मायने में यह नया है मगर एक और अर्थ में इसमें नया कुछ भी नहीं है. अपने अलग अलग रूपों में फ़ासीवाद जिस ‘कमतर मर्द’ को लामबंद करता है और हिंदुत्व जिसका अन्यतम रूप है, वह दरअसल स्वाती जिसे “सैंकड़ों साल पुरानी सोच का पोखरा” कहती हैं, उसमें पलता ज़रूर है मगर कुल मिलाकर वह अपने से सामाजिक तौर पर कमज़ोर तबकों के उभार के डर से उग्र हो जाता है. औरतों के बराबरी के दावे हों या दलितों और मजदूरों के, वे उसकी तमाम कुंठाओं को जगा कर सामने ले आते हैं. इसीलिये उसके अधिकांश डर यौन कुंठाओं के इर्द-गिर्द ही चक्कर काटते हैं. मुसलमान हमारी औरतों को ‘लव जिहाद’ के ज़रिये भगा कर ले जा रहे हैं, दलितों को फुसला कर धर्मान्तरण कर रहे हैं (लिहाज़ा ‘घर वापसी’) इत्यादि इत्यादि.  यह ‘कमतर मर्द’ अपनी मर्दानगी को और कहीं तो प्रदर्शित नहीं कर पाता है इसलिए हमेशा एक अधिनायक की तलाश में रहता है जिसके मर्दानगी में वह अपनी आप को ढूँढने की कोशिश करता है, विलीन कर देता  है. उसकी यौन  कुंठाएं उसे औरतों के उभरते नए किरदार से खौफज़दा कर देती हैं, और वह आखिरकार यह भी तय कर डालना चाहता है कि औरतें मर्दों से कब और कैसे मिलेंगी; मिलेंगी या नहीं. सार्वजानिक जगहों  पर, पार्कों में, सिनेमा घरों में  या रेस्तोरांओं में जायेंगी कि नहीं, लोग मुहब्बत करेंगे तो कैसे करेंगे. औरत औरत से और मर्द मर्द से मुहब्बत करे तो इसकी कुंठाएं बेक़ाबू हो जाती हैं. समाज का ताना बना, उसका सत्ता विन्यास, जस का तस रहे यही इस मर्द के लिए सबसे सुकूनदेह हालत हो सकती है. जैसे ही उसका सत्ता विन्यास बदलने लगता है वह वैसे ही पगलाया सा लगने लगता है जैसे हमारे सौरव  भट्टाचार्य और अमरेन्द्र सिंह. जेएन यू से इन सब की शिकायत यही है कि वह पारंपरिक सामाजिक सत्ता विन्यास पर सवाल उठाना सिखाता है.
9 Comments leave one →
  1. Zafar permalink
    February 21, 2016 9:42 PM

    This is very common now on our FB pages, Twitter, etc. even sometime our friends also use derogatory comments. by the way, If some JNU students are eligible for sedition charges for just “shouting” anti-national slogans then these goons should also get punishment on charges of planning/attempting Rape ;).

  2. Preeti Chauhan permalink
    February 22, 2016 11:28 AM

    Maa bharti ki bhaasha ye kaise ho sakti hai jise sunkar ulti hi aane lage…ye kaun si maa hai jo apne beton ko aise sansakaar deti hai…ye kaisi maa hai jiski beteiyon ke liye itne bhadde shabd ka upyog va itne ghinone krityon ki soch rakhi jaati hai! Kaun si kalpana ki maa hai ye aur kyun?

  3. dharm permalink
    February 26, 2016 11:15 AM

    shameless we Indians…..

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